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प्रेरक कहानियों के इस अंक में पू स्वामिनी अमितानन्दजी महाभारत का एक सुन्दर प्रसंग सुना रही हैं। महाराज युधिष्ठिर अपनी धर्म-निष्ठा के लिए बहुत प्रसिद्द थे। एक बार वे सभा में बैठे थे और एक ब्राह्मण भिक्षुक उनके पास आया और दान के लिए निवेदन किया। ब्राह्मण को दान देना एक अत्यंत पुण्यकारी एवं सौभाग्य की बात होती है। ब्राह्मणों का संरक्षण और संवर्धन वस्तुतः ज्ञान के संवर्धन का पर्याय होता है अतः ऐसे कार्य को अविलम्ब करना चाहिए। महाराज ने व्यस्तता के कारण यह कहलवा दिया की ब्राह्मणदेवता से कहो की वे कृपया कल आ जाएँ तो वे दान अवश्य देंगे। इतना कहना था की भीम खड़े हो गए और शंखनाद करने लगे की "महाराज युधिष्ठिर की जय हो, उन्होंने काल पर विजय प्राप्त कर ली है"। युधिष्ठिरजी ने जब पुछवाया तो उन्होंने कहा की आप ने ब्राह्मण को कल आने को कहा है अतः आप को पता है की कल तक काल भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है अर्थात आपने काल पर विजय प्राप्त कर ली है। महाराज को अपनी गलती समझ आ गयी और उन्होंने दान जैसे पुण्य कार्य को बिना विलम्ब पूरा किया।
By Vedanta Ashramप्रेरक कहानियों के इस अंक में पू स्वामिनी अमितानन्दजी महाभारत का एक सुन्दर प्रसंग सुना रही हैं। महाराज युधिष्ठिर अपनी धर्म-निष्ठा के लिए बहुत प्रसिद्द थे। एक बार वे सभा में बैठे थे और एक ब्राह्मण भिक्षुक उनके पास आया और दान के लिए निवेदन किया। ब्राह्मण को दान देना एक अत्यंत पुण्यकारी एवं सौभाग्य की बात होती है। ब्राह्मणों का संरक्षण और संवर्धन वस्तुतः ज्ञान के संवर्धन का पर्याय होता है अतः ऐसे कार्य को अविलम्ब करना चाहिए। महाराज ने व्यस्तता के कारण यह कहलवा दिया की ब्राह्मणदेवता से कहो की वे कृपया कल आ जाएँ तो वे दान अवश्य देंगे। इतना कहना था की भीम खड़े हो गए और शंखनाद करने लगे की "महाराज युधिष्ठिर की जय हो, उन्होंने काल पर विजय प्राप्त कर ली है"। युधिष्ठिरजी ने जब पुछवाया तो उन्होंने कहा की आप ने ब्राह्मण को कल आने को कहा है अतः आप को पता है की कल तक काल भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है अर्थात आपने काल पर विजय प्राप्त कर ली है। महाराज को अपनी गलती समझ आ गयी और उन्होंने दान जैसे पुण्य कार्य को बिना विलम्ब पूरा किया।