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पू स्वामिनी अमितानन्द जी तानसेन जी के गुरु हरिदास जी का प्रसंग सुना रही हैं। एक बार तानसेनजी का वीणावादन बादशाह अकबर सुन रहे थे, उनको बहुत अच्छा लगा और जब वे उनकी तारीफ़ करने लगे तो उन्होंने बड़ी विनम्रता के साथ बादशाह को निवेदन किया की उनका वीणावादन तो कुछ नहीं है उन्हें उनके गुरु की वीणावादन सुनना चाहिए। उसके लिए उन्हें चुपचाप जंगल में जाना पड़ेगा और उनका सुनना पड़ेगा। जब उन्होंने सुना तो वे स्तब्ध रह गए। उसका रहस्य बताते तानसेन ने बताया की वे तो ईश्वर की आराधना के लिए बजाते हैं - यह ही उनकी वीणा की दिव्य मधुरता का राज़ है।
By Vedanta Ashramपू स्वामिनी अमितानन्द जी तानसेन जी के गुरु हरिदास जी का प्रसंग सुना रही हैं। एक बार तानसेनजी का वीणावादन बादशाह अकबर सुन रहे थे, उनको बहुत अच्छा लगा और जब वे उनकी तारीफ़ करने लगे तो उन्होंने बड़ी विनम्रता के साथ बादशाह को निवेदन किया की उनका वीणावादन तो कुछ नहीं है उन्हें उनके गुरु की वीणावादन सुनना चाहिए। उसके लिए उन्हें चुपचाप जंगल में जाना पड़ेगा और उनका सुनना पड़ेगा। जब उन्होंने सुना तो वे स्तब्ध रह गए। उसका रहस्य बताते तानसेन ने बताया की वे तो ईश्वर की आराधना के लिए बजाते हैं - यह ही उनकी वीणा की दिव्य मधुरता का राज़ है।