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पू स्वामिनि अमितानन्दजी एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुना रही हैं जहाँ एक राजा जो की अपने कार्य में बहुत अच्छा था लेकिन साथ साथ वो काना भी था। उसे अपनी एक ऐसी तस्वीर बनवाने की इच्छा हुई जो वो अपने महान पूर्वजों के चित्रों की गैलरी में टांग सके। अनेकों चित्रकार आये लेकिन ज़्यदातर सब सोचने लगे की काने राजा के चित्र में तो कानापना तो दिखाना ही पड़ेगा तो अच्छा चित्र कैसे बनायें ? लेकिन फिर भी एक ऐसा चित्रकार आया जिसने अपने चित्रकारी से काने राजा का ऐसा चित्र बनाया जहाँ पर दोष दोष ही नहीं रहा और शेष अच्छे उभर के आ गयी। कैसा था वह चित्र - इस कहानी में सुने।
By Vedanta Ashramपू स्वामिनि अमितानन्दजी एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुना रही हैं जहाँ एक राजा जो की अपने कार्य में बहुत अच्छा था लेकिन साथ साथ वो काना भी था। उसे अपनी एक ऐसी तस्वीर बनवाने की इच्छा हुई जो वो अपने महान पूर्वजों के चित्रों की गैलरी में टांग सके। अनेकों चित्रकार आये लेकिन ज़्यदातर सब सोचने लगे की काने राजा के चित्र में तो कानापना तो दिखाना ही पड़ेगा तो अच्छा चित्र कैसे बनायें ? लेकिन फिर भी एक ऐसा चित्रकार आया जिसने अपने चित्रकारी से काने राजा का ऐसा चित्र बनाया जहाँ पर दोष दोष ही नहीं रहा और शेष अच्छे उभर के आ गयी। कैसा था वह चित्र - इस कहानी में सुने।