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साधना पञ्चकं प्रवचन माला का श्रीगणेश करते हुए वेदान्त आश्रम, इंदौर के प.पू. स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने "साधना पञ्चकं" नामक ग्रन्थ का अपनी अत्यंत प्रसन्न एवं गंभीर शैली में परिचय दिया। इसके अधिकारी, विषय, प्रयोजन एवं ग्रन्थ की भूमिका बताई। उन्होंने यह भी बताया की ‘साधना’ शब्द सापेक्ष्य होता है, अर्थात किसी भी साधक को सर्वप्रथम अपने साध्य की अति स्पष्टता एवं उसके प्रति अथाह प्रेम होना अनिवार्य होता है। साधन भी प्रामाणिक होना चाहिए, ज्यादातर साधक किसी साधन से आसक्त हो जाते हैं। यहाँ पर आचार्य ४० साधना के सोपान बताते हैं, एक से उचित लाभ लो फिर आगे बढ़ चलो। तब तक रुकना नहीं है जब तक परमात्मा से एक न हो जाएँ।
By Vedanta Ashramसाधना पञ्चकं प्रवचन माला का श्रीगणेश करते हुए वेदान्त आश्रम, इंदौर के प.पू. स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने "साधना पञ्चकं" नामक ग्रन्थ का अपनी अत्यंत प्रसन्न एवं गंभीर शैली में परिचय दिया। इसके अधिकारी, विषय, प्रयोजन एवं ग्रन्थ की भूमिका बताई। उन्होंने यह भी बताया की ‘साधना’ शब्द सापेक्ष्य होता है, अर्थात किसी भी साधक को सर्वप्रथम अपने साध्य की अति स्पष्टता एवं उसके प्रति अथाह प्रेम होना अनिवार्य होता है। साधन भी प्रामाणिक होना चाहिए, ज्यादातर साधक किसी साधन से आसक्त हो जाते हैं। यहाँ पर आचार्य ४० साधना के सोपान बताते हैं, एक से उचित लाभ लो फिर आगे बढ़ चलो। तब तक रुकना नहीं है जब तक परमात्मा से एक न हो जाएँ।