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साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के ६ठे प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित पांचवे सोपान एवं सूत्र पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की “पापौघः परिधूयतां" - अर्थात पाप के समूह को पूरी तरह से धो डालो। प्रत्येक जीवा का जन्म अज्ञान के कारण होता है, इसलिए बहार से देखा-देखी से गलत धारणाएं ही हम सब में घर कर जाती हैं, और मोहात्मक धारणाओं से प्रेरित विचार और कर्म सब पाप की श्रेणी में आते हैं। अतः प्रत्येक जीव के मन में पाप होता ही है। कई बार तो पाप का घड़ा पूरा भरा ही होता है - इनको दूर करने का प्रयास की यह पाँचवाँ सोपान है।
By Vedanta Ashramसाधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के ६ठे प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित पांचवे सोपान एवं सूत्र पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की “पापौघः परिधूयतां" - अर्थात पाप के समूह को पूरी तरह से धो डालो। प्रत्येक जीवा का जन्म अज्ञान के कारण होता है, इसलिए बहार से देखा-देखी से गलत धारणाएं ही हम सब में घर कर जाती हैं, और मोहात्मक धारणाओं से प्रेरित विचार और कर्म सब पाप की श्रेणी में आते हैं। अतः प्रत्येक जीव के मन में पाप होता ही है। कई बार तो पाप का घड़ा पूरा भरा ही होता है - इनको दूर करने का प्रयास की यह पाँचवाँ सोपान है।