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साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 19वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 18वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "श्रुतिशिरः पक्षः समाश्रितां" - अर्थात महावाक्य के अर्थ को समझने में शास्त्रोक्त पक्ष का ही आश्रय लें। गुरुमुख से महावाक्य सुनने के बाद भी बहुत सारे लोग गलत अर्थ घटित करते हुए पुनः संसार में भटक जाते हैं। इसलिए आचार्य कहते हैं की महावाक्य के शब्दों और फिर पूरे वाक्य का अर्थ गहराई से समझने की प्रक्रिया में शस्त्रविरोधी पक्ष भी होते हैं, लेकिन उनके बच के रहना चाहिए और दृढ़ता पूर्वक अपनी वेदान्त शास्त्र के प्रति अपनी श्रद्धा बनाए रखते हुए अखंडता के अर्थ को घटित करने हेतु श्रुति के पक्ष का ही आश्रय लेना चाहिए।
By Vedanta Ashramसाधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 19वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 18वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "श्रुतिशिरः पक्षः समाश्रितां" - अर्थात महावाक्य के अर्थ को समझने में शास्त्रोक्त पक्ष का ही आश्रय लें। गुरुमुख से महावाक्य सुनने के बाद भी बहुत सारे लोग गलत अर्थ घटित करते हुए पुनः संसार में भटक जाते हैं। इसलिए आचार्य कहते हैं की महावाक्य के शब्दों और फिर पूरे वाक्य का अर्थ गहराई से समझने की प्रक्रिया में शस्त्रविरोधी पक्ष भी होते हैं, लेकिन उनके बच के रहना चाहिए और दृढ़ता पूर्वक अपनी वेदान्त शास्त्र के प्रति अपनी श्रद्धा बनाए रखते हुए अखंडता के अर्थ को घटित करने हेतु श्रुति के पक्ष का ही आश्रय लेना चाहिए।