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साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 21वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 20वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "श्रुतिमतः तर्कोनुसन्धीयतां"- अर्थात, श्रुति-सम्मत तर्क का अनुसन्धान-पूर्वक आश्रय लें। ये पूरा प्रसंग महावाक्य पर मनन करने का प्रसंग चल रहा है। इसी तरह से मनन करा जाता है। आज तक हम भेद बुद्धि में जी रहे थे - अब अगर अभेद और अखंडता में जगाना है तो इन समस्त बिंदुओं का बहुत अच्छी तरह से ध्यान रखना होगा। जब भी कोई संशय आये तो ध्यान रहे की अपनी धारणाओं की पुष्टि हेतु तर्क हमें भेद में ही बनाई रहेगा और श्रुति सम्मत तर्क हमें अभेद की दिशा में ले जायेगा - अतः श्रुति सम्मत तर्क का ही आश्रय लेना उचित होता है।
By Vedanta Ashramसाधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 21वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 20वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "श्रुतिमतः तर्कोनुसन्धीयतां"- अर्थात, श्रुति-सम्मत तर्क का अनुसन्धान-पूर्वक आश्रय लें। ये पूरा प्रसंग महावाक्य पर मनन करने का प्रसंग चल रहा है। इसी तरह से मनन करा जाता है। आज तक हम भेद बुद्धि में जी रहे थे - अब अगर अभेद और अखंडता में जगाना है तो इन समस्त बिंदुओं का बहुत अच्छी तरह से ध्यान रखना होगा। जब भी कोई संशय आये तो ध्यान रहे की अपनी धारणाओं की पुष्टि हेतु तर्क हमें भेद में ही बनाई रहेगा और श्रुति सम्मत तर्क हमें अभेद की दिशा में ले जायेगा - अतः श्रुति सम्मत तर्क का ही आश्रय लेना उचित होता है।