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साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 26वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के चौथे श्लोक में प्रवेश करते हुए साधना पञ्चकं के 25वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "क्षुध व्याधिश्च चिकित्सितां"- अर्थात, भूख रुपी बीमारी का नियमित उपचार करें। मनुष्य शरीर की प्राप्ति ईश्वर का एक बहुत बड़ा आशीर्वाद होता है। शरीर अपने आप में न तो कोई समस्या है और न हो बंधन का कारण। समस्या तो हमारा अज्ञान और मोह होता है। इसी मनुष्य शरीर में रहते हुए ज्ञानी जीवन्मुक्त रहते हुए सबके लिए आशीर्वाद बन जाते हैं, और हमारे शरीरधारी गुरुदेव ने भी हमें ज्ञान दिया। इसलिए शरीर की विवेक से देख भाल करनी चाहिए। उसके लिए आचार्य हमें एक सूत्र दे रहे हैं - की भूख को एक रोग की तरह से देखो और जैसे हम किसी रोग का बिना किसी राग और द्वेष के उचित और नियमित उपचार करते हैं उसी तरह से भूख और शरीर की विवेक से देख-भाल करो।
By Vedanta Ashramसाधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 26वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के चौथे श्लोक में प्रवेश करते हुए साधना पञ्चकं के 25वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "क्षुध व्याधिश्च चिकित्सितां"- अर्थात, भूख रुपी बीमारी का नियमित उपचार करें। मनुष्य शरीर की प्राप्ति ईश्वर का एक बहुत बड़ा आशीर्वाद होता है। शरीर अपने आप में न तो कोई समस्या है और न हो बंधन का कारण। समस्या तो हमारा अज्ञान और मोह होता है। इसी मनुष्य शरीर में रहते हुए ज्ञानी जीवन्मुक्त रहते हुए सबके लिए आशीर्वाद बन जाते हैं, और हमारे शरीरधारी गुरुदेव ने भी हमें ज्ञान दिया। इसलिए शरीर की विवेक से देख भाल करनी चाहिए। उसके लिए आचार्य हमें एक सूत्र दे रहे हैं - की भूख को एक रोग की तरह से देखो और जैसे हम किसी रोग का बिना किसी राग और द्वेष के उचित और नियमित उपचार करते हैं उसी तरह से भूख और शरीर की विवेक से देख-भाल करो।