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साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 41वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने साधना पञ्चकं ग्रन्थ के अंतिम सोपान अर्थात 40वें सूत्र की भूमिका एवं रहस्य पर विशद चर्चा करी। इसमें आचार्यश्री कहते हैं की "अथ परब्रह्म-आत्मना स्थीयतां" - अर्थात, अपने को ब्रम्ह जानते हुए स्थित रहो। इस सूत्र में पू. स्वामीजी ने बताया कि अंत में इस ब्रह्मवित अर्थात ब्रह्म-ज्ञानी को अब ब्रह्म मात्र होकर स्थित रहना चाहिए। जानने वाला अज्ञान समाप्ति के लिए एक आवश्यक रोल होता है। जब अज्ञान दूर हो जाये तो अब ब्रह्म-वित् नहीं बल्कि केवल ब्रह्म मात्र रहते हुए स्थित रहना चाहिए। इसके साथ साधना पञ्चकं नाम के ग्रन्थ का समापन हो जाता है।
By Vedanta Ashramसाधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 41वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने साधना पञ्चकं ग्रन्थ के अंतिम सोपान अर्थात 40वें सूत्र की भूमिका एवं रहस्य पर विशद चर्चा करी। इसमें आचार्यश्री कहते हैं की "अथ परब्रह्म-आत्मना स्थीयतां" - अर्थात, अपने को ब्रम्ह जानते हुए स्थित रहो। इस सूत्र में पू. स्वामीजी ने बताया कि अंत में इस ब्रह्मवित अर्थात ब्रह्म-ज्ञानी को अब ब्रह्म मात्र होकर स्थित रहना चाहिए। जानने वाला अज्ञान समाप्ति के लिए एक आवश्यक रोल होता है। जब अज्ञान दूर हो जाये तो अब ब्रह्म-वित् नहीं बल्कि केवल ब्रह्म मात्र रहते हुए स्थित रहना चाहिए। इसके साथ साधना पञ्चकं नाम के ग्रन्थ का समापन हो जाता है।