कृष्ण तो स्वयं मानव शरीर के बंधन में थे.. समझने की आवश्यकता है कि जब वासुदेव के श्री मुख से भगवत ज्ञान प्रकट हुआ, तब उस क्षण, उस वक्त, मानव शरीर में स्थित वह ज्ञान संपूर्ण ब्रह्मांड की आवाज थी। यानी जब कहते हैं वे12 अध्याय में कहते है
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
अर्थात जो किसी से द्वेष नहीं करता और सब का निस्वार्थ कृपामय मित्र है जो ममता और मिथ्या अहंकार से रहित सुख-दुख की प्राप्ति में समान और क्षमावान है तथा जो हानि लाभ में सदा संतुष्ट रहता है दृढ़ निश्चय सहित भक्ति योग के परायण है और जिसने अपने मन बुद्धि को मुझ में ही अर्पण कर रखा है वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
अरे भाई ! आप कहेंगे कि ऐसे कैसे मैं शादी में जाऊं तो सुख होता है किसी मरण क्रिया में जाऊं तो दुख होता है, यह दोनों समान कैसे हो जाएंगे आखिर सांसारिक हैं ,.....हां बात सही है परंतु सुख दुख भाव है feelings है भाव का आना स्वाभाविक है….. समझने की आवश्यकता है परंतु भाव को पकड़कर नहीं रखना है ।किसी प्रियजन की मृत्यु कष्टकारी है परंतु उसी भाव में रह जाना ठीक नहीं होता, नहीं तो लोग कहते हैं सदमा लग गया ।अब शादी ब्याह में खुशी मिलती है चलो यह भी ठीक है... आने के बाद तक भी हम उसी की चर्चा करते हैं परंतु कब तक....?? इंसानी स्वभाव के भीतर जो भाव हर वक्त उठते हैं वे स्वाभाविक हैं, परंतु पकड़ना नहीं है छोड़ना सीखना है, "नदी जैसा बहना है न कि गड्ढों में ठहरा पानी बनना है" और यह सब तब होगा जब स्थिरता आएगी फिर मन से, शरीर से, बुद्धि से, आत्मा के परमात्मा के होने का व ब्रह्मांड की शुभ शक्तियों का आभास भली-भांति होगा और यह तब होगा....
जब कुछ क्षण ईश्वर के चरणों में लगाएंगे