Stories of Singhasan Battisi : सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ

Stories of Singhasan Battisi : सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ

By Arpaa RadioKids & Family
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Stories of Singhasan Battisi : सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ episodes

  • सिंहासन बत्तीसी: बारहवीं पुतली पद्मावती Singhasan Batteesi : Barahveen Putli Padmavati
    पद्मावती
    बारहवीं पुतली पद्मावती ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक दिन रात के समय राजा विक्रमादित्य महल की छत पर बैठे थे। मौसम बहुत सुहाना था। पूनम का चाँद अपने यौवन पर था तथा सब कुछ इतना साफ़-साफ़ दिख रहा था, मानों दिन हो। प्रकृति की सुन्दरता में राजा एकदम खोए हुए थे। सहसा वे चौंक गए। किसी स्री की चीख थी। चीख की दिशा का अनुमान लगाया। लगातार कोई औरत चीख रही थी और सहायता के लिए पुकार रही थी। उस स्री को विपत्ति से छुटकारा दिलाने के लिए विक्रम ने ढाल-तलवार सम्भाली और अस्तबल से घोड़ा निकाला। घोड़े पर सवार हो फौरन उस दिशा में चल पड़े। कुछ ही समय बाद वे उस स्थान पर पहुँचे। 

    उन्होंने देखा कि एक स्री "बचाओ बचाओ" कहती हुई बेतहाशा भागी जा रही है और एक विकराल दानव उसे पकड़ने के लिए उसका पीछा कर रहा है। विक्रम ने एक क्षण भी नहीं गँवाया और घोड़े से कूद पड़े। युवती उनके चरणों पर गिरती हुई बचाने की विनती करने लगी। उसकी बाँहें पकड़कर विक्रम ने उसे उठाया और उसे बहन सम्बोधित करके ढाढ़स बंधाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि वह राजा विक्रमादित्य की शरणागत है और उनके रहते उस पर कोई आँच नहीं आ सकती। जब वे उसे दिलासा दे रहे थे, तो राक्षस ने अट्टहास लगाया। उसने विक्रम को कहा कि उन जैसा एक साधारण मानव उसका कुछ नहीं बिगाड सकता तथा उन्हें वह कुछ ही क्षणों में पशु की भाँति चीड़ फाड़कर रख देगा। ऐसा बोलते हुए वह विक्रम की ओर लपका। 

    विक्रम ने उसे चेतावनी देते हुए ललकारा। राक्षस ने उनकी चेतावनी का उपहास किया। उसे लग रहा था कि विक्रम को वह पल भर में मसल देगा। वह उनकी ओर बढ़ता रहा। विक्रम भी पूरे सावधान थे। वह ज्योंहि विक्रम को पकड़ने के लिए बढ़ा विक्रम ने अपने को बचाकर उस पर तलवार से वार किया। राक्षस भी अत्यन्त फुर्तीला था। उसने पैंतरा बदलकर खुद को बचा लिया और भिड़ गया। दोनों में घमासान युद्ध होने लगा। विक्रम ने इतनी फुर्ती और चतुराई से युद्ध किया कि राक्षस थकान से चूर हो गया तथा शिथिल पड़ गया। विक्रम ने अवसर का पूरा लाभ उठाया तथा अपनी तलवार से राक्षस का सर धड़ से अलग कर दिया। विक्रम ने समझा राक्षस का अन्त हो चुका है, मगर दूसरे ही पल उसका कटा सिर फिर अपनी जगह आ लगा और राक्षस दुगुने उत्साह से उठकर लड़ने लगा। इसके अलावा एक और समस्या हो गई। 

    जहाँ उसका रक्त गिरा था वहाँ एक और राक्षस पैदा हो गया। राजा विक्रमादित्य क्षण भर को तो चकित हुए, किन्तु विचलित हुए बिना एक साथ दोनों राक्षसों का सामना करने लगे। रक्त से जन्मे राक्षस ने मौका देखकर उन पर घूँसे का प्रहार किया तो उन्होंने पैंतरा बदलकर पहले वार में उसकी भुजाएँ तथा दूसरे वार में उसकी टांगें काट डालीं। राक्षस असह्य पीड़ा से इतना चिल्लाया कि पूरा वन गूंज गया। उसे दर्द से तड़पता देखकर राक्षस का धैर्य जवाब दे गया और मौका पाकर वह सर पर पैर रखकर भागा। चूँकि उसने पीठ दिखाई थी, इसलिए विक्रम ने उसे मारना उचित नहीं समझा। उस राक्षस के भाग जाने के बाद विक्रम उस स्री के पास आए तो देखा कि वह भय के मारे काँप रही है। उन्होंने उससे कहा कि उसे निश्चिन्त हो जाना चाहिए और भय त्याग देना चाहिए, क्योंकि दानव भाग चुका है। 

    उन्होंने उसे अपने साथ महल चलने को कहा ताकि उसे उसके माँ-बाप के पास पहुँचा दे। उस स्री ने जवाब दिया कि खतरा अभी टला नहीं है, क्योंकि राक्षस मरा नहीं। वह लौटकर आएगा और उसे ढूंढकर फिर इसी स्थान पर ले आएगा। जब विक्रम ने उसका परिचय जानना चाहा, तो वह बोली कि वह सिंहुल द्वीप की रहनेवाली है और एक ब्राह्मण की बेटी है। एक दिन वह तालाब में सखियों के साथ तालाब में नहा रही थी तभी राक्षस ने उसे देख लिया और मोहित हो गया। वहीं से वह उसे उठाकर यहाँ ले आया और अब उसे अपना पति मान लेने को कहता है। उसने सोच लिया है कि अपने प्राण दे देगी, मगर अपनी पवित्रता नष्ट नहीं होने देगी। वह बोलते-बोलते सिसकने लगी और उसका गला र्रूँध गया। 

    विक्रम ने उसे आश्वासन दिया कि वे राक्षस का वध करके उसकी समस्या का अन्त कर देंगे और उन्होंने राक्षस के फिर से जीवित होने का राज़ पूछा। उस स्री ने जवाब दिया कि राक्षस के पेट में एक मोहिनी वास करती है जो उसके मरते ही उसके मुँह में अमृत डाल देती है। उसे तो वह जीवित कर सकती है, मगर उसके रक्त से पैदा होने वाले दूसरे राक्षस को नहीं, इसलिए वह दूसरा राक्षस अपंग होकर दम तोड़ रहा है। यह सुनकर विक्रम ने कहा कि वे प्रण करते हैं कि उस राक्षस का वध किए बगैर अपने महल नहीं लौटेंगे चाहे कितनी भी प्रतीक्षा क्यों न करनी पड़े। उन्होंने जब उससे मोहिनी के बारे में पूछा तो स्री ने अनभिज्ञता जताई। विक्रम एक पेड़ की छाया में विश्राम करने लगे। तभी एक सिंह झाड़ियों में से निकलकर विक्रम पर झपटा। 

    चूँकि विक्रम पूरी तरह चौकन्ने नहीं थे, इसलिए सिंह उनकी बाँह पर घाव लगाता हुआ चला गया। अब विक्रम भी पूरी तरह हमले के लिए तैयार हो गए। दूसरी बार जब सिंह उनकी ओर झपटा तो उन्होंने उसके पैरों को पकड़कर उसे पूरे ज़ोर से हवा में उछाल दिया। सिंह बहुत दूर जाकर गिरा और क्रुद्ध होकर उसने गर्जना की। दूसरे ही पल सिंह ने भागने वाले राक्षस का रुप धर लिया। अब विक्रम की समझ में आ गया कि उसने छल से उन्हें हराना चाहा था। वे लपक कर राक्षस से भिड़ गए। दोनों में फिर भीषण युद्ध शुरु हो गया। जब राक्षस की साँस लड़ते-लड़ते फूलने लगी, तो विक्रम ने तलवार उसके पेट में घुसेड़ दी। 

    राक्षस धरती पर गिरकर दर्द से चीखने लगा। विक्रम ने उसके बाद तलवार से उसका पेट फाड़ दिया। पेट फटते ही मोहिनी कूदकर बाहर आई और अमृत लाने दौड़ी। विक्रम ने बेतालों का स्मरण किया और उन्हें मोहिनी को पकड़ने का आदेश दिया। अमृत न मिल पाने के कारण राक्षस तड़पकर मर गया। मोहिनी ने अपने बारे में बताया कि वह शिव की गणिका थी जिसे किसी गलती की सज़ा के रुप में राक्षस की सेविका बनना पड़ा। महल लौटकर विक्रम ने ब्राह्मण कन्या को उसके माता-पिता को सौप दिया और मोहिनी से खुद विधिवत् विवाह कर लिया।
    7 min
  • सिंहासन बत्तीसी: ग्यारहवीं पुतली त्रिलोचनी : Trilochani
    त्रिलोचनी
    ग्यारहवीं पुतली त्रिलोचनी जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य बहुत बड़े प्रजापालक थे। उन्हें हमेंशा अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि की ही चिन्ता सताती रहती थी। एक बार उन्होंने एक महायज्ञ करने की ठानी। असंख्य राजा-महाराजाओं, पण्डितों और ॠषियों को आमन्त्रित किया। यहाँ तक कि देवताओं को भी उन्होंने नहीं छोड़ा।

    पवन देवता को उन्होंने खुद निमन्त्रण देने का मन बनाया तथा समुद्र देवता को आमन्त्रित करने का काम एक योग्य ब्राह्मण को सौंपा। दोनों अपने काम से विदा हुए। जब विक्रम वन में पहुँचे तो उन्होंने तय करना शुरु किया ताकि पवन देव का पता-ठिकाना ज्ञात हो। योग-साधना से पता चला कि पवन देव आजकल सुमेरु पर्वत पर वास करते हैं। उन्होंने सोचा अगर सुमेरु पर्वत पर पवन देवता का आह्मवान किया जाए तो उनके दर्शन हो सकते है। उन्होंने दोनों बेतालों का स्मरण किया तो वे उपस्थित हो गए। उन्होंने उन्हें अपना उद्देश्य बताया। बेतालों ने उन्हें आनन-फानन में सुमेरु पर्वत की चोटी पर पहुँचा दिया। चोटी पर इतना तेज हवा थी कि पाँव जमाना मुश्किल था। 

    बड़े-बड़े वृक्ष और चट्टान अपनी जगह से उड़कर दूर चले जा रहे थे। मगर विक्रम तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे योग-साधना में सिद्धहस्त थे, इसलिए एक जगह अचल होकर बैठ गए। बाहरी दुनिया को भूलकर पवन देव की साधना में रत हो गए। न कुछ खाना, न पीना, सोना और आराम करना भूलकर साधना में लीन रहे। आखिरकार पवन देव ने सुधि ली। हवा का बहना बिल्कुल थम गया। मन्द-मन्द बहती हुई वायु शरीर की सारी थकान मिटाने लगी। आकाशवाणी हुई- "हे राजा विक्रमादित्य, तुम्हारी साधना से हम प्रसन्न हुए। अपनी इच्छा बता।"

    विक्रम अगले ही क्षण सामान्य अवस्था में आ गए और हाथ जोड़कर बोले कि वे अपने द्वारा किए जा रहे महायज्ञ में पवन देव की उपस्थिति चाहते हैं। पवन देव के पधारने से उनके यज्ञ की शोभा बढ़ेगी। यह बात विक्रम ने इतना भावुक होकर कहा कि पवन देव हँस पड़े। उन्होंने जवाब दिया कि सशरीर यज्ञ में उनकी उपस्थिति असंभव है। वे अगर सशरीर गए, तो विक्रम के राज्य में भयंकर आँधी-तूफान आ जाएगा। सारे लहलहाते खेत, पेड़-पौधे, महल और झोपड़ियाँ- सब की सब उजड़ जाएँगी। रही उनकी उपस्थिति की बात, तो संसार के हर कोने में उनका वास है, इसलिए वे अप्रत्यक्ष रुप से उस महायज्ञ में भी उपस्थित रहेंगे। विक्रम उनका अभिप्राय समझकर चुप हो गए। पवन देव ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि उनके राज्य में कभी अनावृष्टि नहीं होगी और कभी दुर्भिक्ष का सामना उनकी प्रजा नहीं करेगी। उसके बाद उन्होंने विक्रम को कामधेनु गाय देते हुए कहा कि इसकी कृपा से कभी भी विक्रम के राज्य में दूध की कमी नहीं होगी। जब पवनदेव लुप्त हो गए, तो विक्रमादित्य ने दोनों बेतालों का स्मरण किया और बेताल उन्हें लेकर उनके राज्य की सीमा तक आए।

    जिस ब्राह्मण को विक्रम ने समुद्र देवता को आमन्त्रित करने का भार सौंपा था, वह काफी कठिनाइयों को झेलता हुआ सागर तट पर पहुँचा। उसने कमर तक सागर में घुसकर समुद्र देवता का आह्मवान किया। उसने बार-बार दोहराया कि महाराजा विक्रमादित्य महायज्ञ कर रहे हैं और वह उनका दूत बनकर उन्हें आमंत्रित करने आया है। अंत में समुद्र देवता असीम गहराई से निकलकर उसके सामने प्रकट हुए। उन्होंने ब्राह्मण से कहा कि उन्हें उस महायज्ञ के बारे में पवन देवता ने सब कुछ बता दिया है। वे पवन देव की तरह ही विक्रमादित्य के आमन्त्रण का स्वागत तो करते हैं, लेकिन सशरीर वहाँ सम्मिलित नहीं हो सकते हैं। ब्राह्मण ने समुद्र देवता से अपना आशय स्पष्ट करने का सादर निवेदन किया, तो वे बोले कि अगर वे यज्ञ में सम्मिलित होने गए तो उनके साथ अथाह जल भी जाएगा और उसके रास्तें में पड़नेवाली हर चीज़ डूब जाएगी। चारों ओर प्रलय-सी स्थिति पैदा हो जाएगी। सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

    जब ब्राह्मण ने जानना चाहा कि उसके लिए उनका क्या आदेश हैं, तो समुद्र देवता बोले कि वे विक्रम को सकुशल महायज्ञ सम्पन्न कराने के लिए शुभकामनाएँ देते हैं। अप्रत्यक्ष रुप में यज्ञ में आद्योपति विक्रम उन्हें महसूस करेंगे, क्योंकि जल की एक-एक बून्द में उनका वास है। यज्ञ में जो जल प्रयुक्त होगा उसमें भी वे उपस्थित रहेंगे। उसके बाद उन्होंने ब्राह्मण को पाँच रत्न और एक घोड़ा देते हुए कहा- "मेरी ओर से राजा विक्रमादित्य को ये उपहार दे देना।" ब्राह्मण घोड़ा और रत्न लेकर वापस चल पड़ा। उसको पैदल चलता देख वह घोड़ा मनुष्य की बोली में उससे बोला कि इस लंबे सफ़र के लिए वह उसकी पीठ पर सवार क्यों नहीं हो जाता। 

    उसके ना-नुकुर करने पर घोड़े ने उसे समझाया कि वह राजा का दूत है, इसलिए उसके उपहार का उपयोग वह कर सकता है। ब्राह्मण जब राज़ी होकर बैठ गया तो वह घोड़ा पवन वेग से उसे विक्रम के दरबार ले आया। घोड़े की सवारी के दौरान उसके मन में इच्छा जगी- "काश! यह घोड़ा मेरा होता!" जब विक्रम को उसने समुद्र देवता से अपनी बातचीत सविस्तार बताई और उन्हें उनके दिए हुए फुहार दिए, तो उन्होंने उसे पाँचों रत्न तथा घोड़ा उसे ही प्राप्त होने चाहिए, चूँकि रास्ते में आनेवाली सारी कठिनाइयाँ उसने राजा की खातिर हँसकर झेलीं। उनकी बात समुद्र देवता तक पहुँचाने के लिए उसने कठिन साधना की। ब्राह्मण रत्न और घोड़ा पाकर फूला नहीं समाया।
    7 min
  • सिंहासन बत्तीसी: दसवीं पुतली प्रभावती : Prabhavati
    प्रभावती
    दसवीं पुतली प्रभावती ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक बार राजा विक्रमादित्य शिकार खेलते-खेलते अपने सैनिकों की टोली से काफी आगे निकलकर जंगल में भटक गए। उन्होंने इधर-उधर काफी खोजा, पर उनके सैनिक उन्हें नज़र नहीं आए। उसी समय उन्होंने देखा कि एक सुदर्शन युवक एक पेड़ पर चढ़ा और एक शाखा से उसने एक रस्सी बाँधी। रस्सी में फंदा बना था उस फन्दे में अपना सर डालकर झूल गया। विक्रम समझ गए कि युवक आत्महत्या कर रहा है। उन्होंने युवक को नीचे से सहारा देकर फंदा उसके गले से निकाला तथा उसे डाँटा कि आत्महत्या न सिर्फ पाप और कायरता है, बल्कि अपराध भी है। इस अपराध के लिए राजा होने के नाते वे उसे दण्डित भी कर सकते हैं। युवक उनकी रोबीली आवाज़ तथा वेशभूषा से ही समझ गया कि वे राजा है, इसलिए भयभीत हो गया। 

    राजा ने उसकी गर्दन सहलाते हुए कहा कि वह एक स्वस्थ और बलशाली युवक है फिर जीवन से निराश क्यों हो गया। अपनी मेहनत के बल पर वह आजीविका की तलाश कर सकता है। उस युवक ने उन्हें बताया कि उसकी निराशा का कारण जीविकोपार्जन नहीं है और वह विपन्नता से निराश होकर आत्महत्या का प्रयास नहीं कर रहा था। राजा ने जानना चाहा कि कौन सी ऐसी विवशता है जो उसे आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रही है। उसने जो बताया वह इस प्रकार है- उसने कहा कि वह कालिं का रहने वाला है तथा उसका नाम वसु है। एक दिन वह जंगल से गुज़र रहा था कि उसकी नज़र एक अत्यन्त सुन्दर लड़की पर पड़ी। वह उसके रुप पर इतना मोहित हुआ कि उसने उससे उसी समय प्रणय निवेदन कर डाला। 

    उसके प्रस्ताव पर लड़की हँस पड़ी और उसने उसे बताया कि वह किसी से प्रेम नहीं कर सकती क्योंकि उसके भाग्य में यही बदा है। दरअसल वह एक अभागी राजकुमारी है जिसका जन्म ऐसे नक्षत्र में हुआ कि उसका पिता ही उसे कभी नहीं देख सकता अगर उसके पिता ने उसे देखा, तो तत्क्षण उसकी मृत्यु हो जाएगी। उसके जन्मतें ही उसके पिता ने नगर से दूर एक सन्यासी की कुटिया में भेज दिया और उसका पालन पोषण उसी कुटिया में हुआ। उसका विवाह भी उसी युवक से संभव है जो असंभव को संभव करके दिखा दे। उस युवक को खौलते तेल के कड़ाह में कूदकर ज़िन्दा निकलकर दिखाना होगा।

    उसकी बात सुनकर वसु उस कुटिया में गया जहाँ उसके निवास था। वहाँ जाने पर उसने कई अस्थि पं देखे जो उस राजकुमारी से विवाह के प्रयास में खौलते कड़ाह के तेल में कूदकर अपनी जानों से हाथ धो बैठे थे। वसु की हिम्मत जवाब दे गई। वह निराश होकर वहाँ से लौट गया। उसने उसे भुलाने की लाख कोशिश की, पर उसका रुप सोते-जागते, उठते-बैठते- हर आँखों के सामने आ जाता है। उसकी नींद उड़ गई है। उसे खाना-पीना नहीं अच्छा लगता है। अब प्रणान्त कर लेने के सिवा उसके पास कोई चारा नही बचा है।

    विक्रम ने उसे समझाना चाहा कि उस राजकुमारी को पाना सचमुच असंभव है, इसलिए वह उसे भूलकर किसी और को जीवन संगिनी बना ले, लेकिन युवक नहीं माना। उसने कहा कि विक्रम ने उसे व्यर्थ ही बचाया। उन्होंने उसे मर जाने दिया होता, तो अच्छा होता। विक्रम ने उससे कहा कि आत्महत्या पाप है, और यह पाप अपने सामने वह नहीं होता देख सकते थे। उन्होंने उसे वचन दिया कि वे राजकुमारी से उसका विवाह कराने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। फिर उन्होंने माँ काली द्वारा प्रदत्त दोनो बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेताल पलक झपकते ही उपस्थित हुए तथा कुछ ही देर में उन दोनों को लेकर उस कुटिया में आए जहाँ राजकुमारी रहती थी। वह बस कहने को कुटिया थी। राजकुमारी की सारी सुविधाओं का ख्याल रखा गया था। नौकर-चाकर थे। 

    राजकुमारी का मन लगाने के लिए सखी-सहोलियाँ थीं। तपस्वी से मिलकर विक्रमादित्य ने वसु के लिए राजकुमारी का हाथ मांगा। तपस्वी ने राजा विक्रमादित्य का परिचय पाकर कहा कि अपने प्राण वह राजा को सरलता से अर्पित कर सकता है, पर राजकुमारी का हाथ उसी युवक को देगा जो खौलते तेल से सकुशल निकल आए, तो किसी अन्य के लिए राजकुमारी का हाथ मांग सकता है या नहीं। इस पर तपस्वी ने कहा कि बस यह शर्त पूरी होनी चाहिए। वह अपने लिए हाथ मांग रहा है या किसी अन्य के लिए, यह बात मायने नहीं रखती है। उसने राजा को विश्वास दिलाने की कोशिश की कि इस राजकुमारी को कुँआरी ही रहना पड़ेगा। जब विक्रम ने उसे बताया कि वे खुद ही इस युवक के हेतु कड़ाह में कूदने को तैयार हैं तो तपस्वी का मुँह विस्मय से खुला रहा गया। वे बात ही कर रहे थे कि राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ वहाँ आई। वह सचमुच अप्सराओं से भी ज़यादा सुन्दर थी। अगर युवकों ने खौलते कड़ाह में कूदकर प्राण गँवाए, तो कोई गलत काम नहीं किया।

    विक्रम ने तपस्वी से कहकर कड़ाह भर तेल की व्यवस्था करवाई। जब तेल एकदम खौलने लगा, तो माँ काली को स्मरण कर विक्रम तेल में कूद गए। खौलते तेल में कूदते ही उनके प्राण निकल गए और शरीर भुनकर स्याह हो गया। माँ काली को उन पर दया आ गई और उन्होंने बेतालों को विक्रम को जीवित करने की आज्ञा दी। बेतालों ने अमृत की बून्दें उनके मुँह में डालकर उन्हें ज़िन्दा कर दिया। जीवित होते ही उन्होंने वसु के लिए राजकुमारी का हाथ मांगा। राजकुमारी के पिता को खबर भेज दी गई और दोनों का विवाह धूम-धाम से सम्पन्न हुआ।
    7 min
  • सिंहासन बत्तीसी: नवीं पुतली मधुमालती : Madhumalti
    मधुमालती
    नवीं पुतली मधुमालती ने जो कथा सुनाई उससे विक्रमादित्य की प्रजा के हित में प्राणोत्सर्ग करने की भावना झलकती है। कथा इस प्रकार है- एक बार राजा विक्रमादित्य ने राज्य और प्रजा की सुख-समृद्धि के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। कई दिनों तक यज्ञ चलता रहा। एक दिन राजा मंत्र-पाठ कर रहे, तभी एक ॠषि वहाँ पधारे। राजा ने उन्हें देखा, पर यज्ञ छोड़कर उठना असम्भव था। उन्होंने मन ही मन ॠषि का अभिवादन किया तथा उन्हें प्रणाम किया। ॠषि ने भी राज्य का अभिप्राय समझकर उन्हें आशीर्वाद दिया। जब राजा यज्ञ से उठे, तो उन्होंने ॠषि से आने का प्रयोजन पूछा। राजा को मालूम था कि नगर से बाहर कुछ ही दूर पर वन में ॠषि एक गुरुकुल चलाते हैं जहाँ बच्चे विद्या प्राप्त करने जाते हैं। 

    ॠषि ने जवाब दिया कि यज्ञ के पुनीत अवसर पर वे राजा को कोई असुविधा नहीं देते, अगर आठ से बारह साल तक के छ: बच्चों के जीवन का प्रश्न नहीं होता। राजा ने उनसे सब कुछ विस्तार से बताने को कहा। इस पर ॠषि ने बताया कि कुछ बच्चे आश्रम के लिए सूखी लकड़ियाँ बीनने वन में इधर-उधर घूम रहे थे। तभी दो राक्षस आए और उन्हें पकड़कर ऊँची पहाड़ी पर ले गए। ॠषि को जब वे उपस्थित नहीं मिले तो उनकी तलाश में वे वन में बेचैनी से भटकने लगे। तभी पहाड़ी के ऊपर से गर्जना जैसी आवाज सुनाई पड़ी जो निश्चित ही उनमें से एक राक्षस की थी। राक्षस ने कहा कि उन बच्चों की जान के बदले उन्हें एक पुरुष की आवश्यकता है जिसकी वे माँ काली के सामने बलि देंगे। 

    जब ॠषि ने बलि के हेतु अपने-आपको उनके हवाले करना चाहा तो उन्होंने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि ॠषि बूढे हैं और काली माँ ऐसे कमज़ोर बूढ़े की बलि से प्रसन्न नहीं होगी। काली माँ की बलि के लिए अत्यन्त स्वस्थ क्षत्रिय की आवश्यकता है। राक्षसों ने कहा है कि अगर कोई छल या बल से उन बच्चों को स्वतंत्र कराने की चेष्टा करेगा, तो उन बच्चों को पहाड़ी से लुढ़का कर मार दिया जाएगा। राजा विक्रमादित्य से ॠषि की परेशानी नहीं देखी जा रही थी। वे तुरन्त तैयार हुए और ॠषि से बोले- "आप मुझे उस पहाड़ी तक ले चले। मैं अपने आपको काली के सम्मुख बलि के लिए प्रस्तुत कर्रूँगा। मैं स्वस्थ हूँ और क्षत्रिय भी। राक्षसों को कोई आपत्ति नहीं होगी।" ॠषि ने सुना तो हत्प्रभ रह गाए। उन्होंने लाख मनाना चाहा, पर विक्रम ने अपना फैसला नहीं बदला। उन्होंने कहा आगर राजा के जीवित रहते उसके राज्य की प्रजा पर कोई विपत्ति आती है तो राजा को अपने प्राण देकर भी उस विपत्ति को दूर करना चाहिए। 

    राजा ॠषि को साथ लेकर उस पहाड़ी तक पहुँचे। पहाड़ी के नीचे उन्होंने अपना घोड़ा छोड़ दिया तथा पैदल ही पहाड़ पर चढ़ने लगे। पहाड़ीवाला रास्ता बहुत ही कठिन था, पर उन्होंने कठिनाई की परवाह नहीं की। वे चलते-चलते पहाड़ा की चोटी पर पहुँचे। उनके पहुँचते ही एक राक्षस बोला कि वह उन्हें पहचानता है और पूछने लगा कि उन्हें बच्चों की रिहाई की शर्त मालूम है कि नहीं। उन्होंने कहा कि वे सब कुछ जानने के बाद ही यहाँ आए हैं तथआ उन्होंने राक्षसों से बच्चों को छोड़ देने को कहा। एक राक्षस बच्चों को अपनी बाँहों में लेकर उड़ा और नीचे उन्हें सुरक्षित पहुँचा आया। दूसरा राक्षस उन्हें लेकर उस जगह आया जहाँ माँ काली की प्रतिमा थी और बलिवेदी बनी हुई थी विक्रमादित्य ने बलिवेदी पर अपना सर बलि के हेतु झुका दिया। 

    वे ज़रा भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने मन ही मन अन्तिम बार समझ कर भगवान का स्मरण किया और वह राक्षस खड्ग लेकर उनका सर धर से अलग करने को तैयार हुआ। अचानक उस राक्षस ने खड्ग फेंक दिया और विक्रम को गले लगा लिया। वह जगह एकाएक अद्भुत रोशनी तथा खुशबू से भर गया। विक्रम ने देखा कि दोनों राक्षसों की जगह इन्द्र तथा पवन देवता खड़े थे। उन दोनों ने उनकी परीक्षा लेने के लिए यह सब किया था वे देखना चाहते थे कि विक्रम सिर्फ सांसारिक चीज़ों का दान ही कर सकता है या प्राणोत्सर्ग करने की भी क्षमता रखता है। उन्होंने राजा से कहा कि उन्हें यज्ञ करता देख ही उनके मन में इस परीक्षा का भाव जन्मा था। उन्होंने विक्रम को यशस्वी होने का आशीर्वाद दिया तथा कहा कि उनकी कीर्कित्त चारों ओर फैलेगी।



    6 min
  • सिंहासन बत्तीसी: आठवीं पुतली पुष्पवती : Pushpvati
    पुष्पवती
    आठवीं पुतली पुष्पवती की कथा इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य अद्भुत कला-पारखी थे। उन्हें श्रेष्ठ कलाकृतियों से अपने महल को सजाने का शौक था। वे कलाकृतियों का मूल्य आँककर बेचनेवाले को मुँह माँगा दाम देते थे। एक दिन वे अपने दरबारियों के बीच बैठे थे कि किसी ने खबर दी कि एक आदमी काठ का घोड़ा बेचना चाहता है। राजा ने देखना चाहा कि उस काठ के घोड़े की विशेषता क्या है। नौकर के साथ वह आदमी दरबार में आया। अपने साथ वह ऐसा काठ का घोड़े लाया जिसकी कारीगरी देखते बनती थी। एकदम जीवित मालूम पड़ता था। बहुत गौर से देखने पर ही पता चलता था कि लकड़ी का है। विक्रम ने उस आदमी से घोड़े की विशेषताओं के बारे में पूछा। उस आदमी ने जवाब दिया कि वह घोड़ा अति तीव्र गति से जल, थल और आकाश- तीनों में विचरण कर सकता है। 

    उसके दाम के बारे में पूछने पर उसने बताया कि यह उसकी जीवन भर की मेहनत का फल है, इसलिए वह एक लाख स्वर्णमुद्राओं से कम में उसे नहीं बेचेगा। राजा को उसकी बात जँच गई और एक लाख स्वर्ण-मुद्राएँ देकर उन्होंने वह घोड़ा खरीद लिया। फिर वह आदमी खुले मैदान में आकर घोड़े को उठाकर दिखाने लगा तथा उसके कल-पुजाç के बारे में सब कुछ बताने लगा। उसके संचालन की सारी विधि समझकर विक्रम ने घोड़ा अपने अश्वागार में रखवा दिया। एक दिन अपने आदमियों के साथ राजा शिकार को निकले तो खुद उसी घोड़े पर सवार थे। कल-पुजाç को दबाने पर उसकी तेजी इतनी बढ़ गई कि राजा को मज़ा आ गया। वे भूल गए कि आखेट के लिए वे अकेले नहीं निकले हैं। अपनी टोली से बिछुड़कर बहुत दूर आ गए। 

    उन्होंने उसे हवा में उड़ाने के लिए दूसरे कल-पुजाç को दबाया। उसकी गति हवा में इतनी बढ़ गई कि राजा के लिए उसे संभालना मुश्किल जान पड़ा। उन्होंने उसे ज़मीन पर उतारना चाहा तो वह उसी गति से उतरा और एक घने पेड़ की शाखाओं से टकरा कर टुकड़े-टुकड़े हो गया। अब उस निर्जन और अनजान जगह पर राजा अकेले थे। वे इधर-उधर भटक रहे थे तभी सामने एक बन्दरिया कूदी और अपने हाव-भाव से कुछ बताने की कोशिश करने लगी। राजा कुछ समझ पाते तब तक उनकी न एक कुटिया पर पड़ी। राजा को भूख लगी थी और वे थके भी थे। उन्होंने वृक्षों पर लदे फल तोड़े और अपनी भूख मिटाई और एक वृक्ष पर चढ़कर लेट गए। वे विश्राम कर ही रहे थे कि एक सन्यासी आया और बन्दरिया को इशारा करके अपने साथ कुटिया में रखे दो घड़ों के बीच में बन्दरिया को बैठने को कहा। उसके बाद उसने एक घड़े से चुल्लू भर पानी लेकर बन्दरिया के ऊपर छींटे मारे। बन्दरिया एक अत्यन्त रुपवती राजकुमारी बन गई। 

    उसने सन्यासी के लिए भोजन पकाया तथा जब सन्यासी खा चुका तब सन्यासी के हाथ-पैर दबाए और सन्यासी आराम से सो गया। जब सुबह हुई तो सन्यासी ने दूसरे घड़े से चुल्लू भर पानी लेकर राजकुमारी पर छींटे मारे। राजकुमारी फिर से बन्दरिया बन गई। उसे लेकर सन्यासी कुटिया से बाहर आया और उसे वन में स्वतंत्र विचरने को छोड़कर वहीं चला गया। उसके जाने के बाद बन्दरिया को लेकर विक्रम कुटिया में आए और घड़े से पानी लेकर बन्दरिया पर छींटे डाल दिए। बन्दरिया फिर से अनिंद्य सुन्दरी बन गई। राजकुमारी बनते ही उसने राजा को बताया कि वह कामदेव तथा एक अप्सरा की संतान हूँ। "एक बार मैंने शिकार खेलते हुए एक वाण मृग की ओर निशाना लगाकर छोड़ा। वह वाण मृग को नहीं लगकर एक साधु की बाँह को बेध गया। दर्द से कराहते हुए उस साधु ने मुझे श्राप दिया कि बन्दरिया बनकर मुझे साधु की सेवा करनी पड़ेगी। जब मैं रोई-गिड़गिड़ाई कि यह सब अनजाने में हुआ तो उसने पसीजकर श्राप से मुक्ति का रास्ता बताया। उसने कहा कि राजा विक्रमादित्य आकर तुम्हें श्राप से मुक्ति दिलाएँगे तथा तुम्हारा पत्नी के रुप में वरण करेंगे अगर वह साधु तुम्हें कोई चीज़ उपहार स्वरुप देगा। 

    "मैं आपको देखते ही पहचान गई थी। अब साधु के लौटने पर मैं उससे उपहार माँगूगी और आप मेरा पत्नी के रुप में वरण करेंगे।" विक्रम ने फिर पानी के छींटे डालकर उसे बन्दरिया बना दिया। साधु आया और उसने बन्दरिया से उसे राजकुमारी में बदल डाला। राजकुमारी ने उससे कोई उपहार देने को कहा। उसने हवा में हाथ लहराया तो उसके हाथ में खिला हुआ कमल आ गया। उसने कहा यह कमल हर दिन तुम्हें एक रत्न देगा। साधु ने यह भी कहा कि उसे पता है राजा विक्रमादित्य उसकी ज़िन्दगी में आ पहुँचे हैं, इसलिए वह राजकुमारी को बाकी की ज़िन्दगी सुखपूर्वक व्यतीत करने का आशीर्वाद देता है। साधु ने उसके बाद राजकुमारी को अपनी कुटिया से सहर्ष विदा किया। राजकुमारी अब पूरी तरह शाप मुक्त हो गई थी। 

    विक्रम ने तब दोनों बेतालों का स्मरण किया जो उन दोनों को नगर की सीमा पर पहुँचा कर गायब हो गया। नगर में जब उन्होंने प्रवेश किया तो एक बच्चा कमल के पुष्प को प्राप्त करने को मचल उठा। विक्रम ने वह कमल का फूल बच्चे को तुरन्त देकर संतुष्ट किया। फिर महल पहुँचकर राजकाज देखने लगे। कुछ दिनों बाद उनके पास एक गरीब आदमी को पकडकर लाया गया। उसे बहुमूल्य रत्न बेचने के आरोप में बन्दी बनाया गया था। राजा के पूछने पर उसने बताया कि उसके बच्चे को किसी ने एक खिला कमल दिया था, उसी कमल से ये रत्न उसे प्राप्त हुए हैं। विक्रम ने सिपाहियों को बिना करण किसी की ईमानदारी पर शक करने के लिए डाँटा तथा वे सारे रत्न अच्छे मूल्य पर स्वयं खरीद लिए। वह आदमी राजा को दुआएँ देता हुआ संतुष्ट होकर दरबार से विदा हुआ।
    7 min
  • सिंहासन बत्तीसी: सातवीं पुतली कौमुदी : Kaumudi
    कौमुदी
    सातवीं पुतली कौमुदी ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- एक दिन राजा विक्रमादित्य अपने शयन-कक्ष में सो रहे थे। अचानक उनकी नींद करुण-क्रन्दन सुनकर टूट गई। उन्होंने ध्यान लगाकर सुना तो रोने की आवाज नदी की तरफ से आ रही थी और कोई स्री रोए जा रही थी। विक्रम की समझ में नहीं आया कि कौन सा दुख उनके राज्य में किसी स्री को इतनी रात गए बिलख-बिलख कर रोने को विवश कर रहा है। उन्होंने तुरन्त राजपरिधान पहना और कमर में तलवार लटका कर आवाज़ की दिशा में चल पड़े। क्षिप्रा के तट पर आकर उन्हें पता चला कि वह आवाज़ नदी के दूसरे किनारे पर बसे जंगल से आ रही है। उन्होंने तुरन्त नदी में छलांग लगा दी तथा तैरकर दूसरे किनारे पर पहुँचे। फिर चलते-चलते उस जगह पहुँचे जहाँ से रोने की आवाज़ आ रही थी। उन्होंने देखा कि झाड़ियों में बैठी एक स्री रो रही है। 

    उन्होंने उस स्री से रोने का कारण पूछा। स्री ने कहा कि वह कई लोगों को अपनी व्यथा सुना चुकी है, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। राजा ने उसे विश्वास दिलाया कि वे उसकी मदद करने का हर संभव प्रयत्न करेंगे। तब स्री ने बताया कि वह एक चोर की पत्नी है और पकड़े जाने पर नगर कोतवाल ने उसे वृक्ष पर उलटा टँगवा दिया है। राजा ने पूछा क्या वह इस फैसले से खुश नहीं है। इस पर औरत ने कहा कि उसे फैसले पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वह अपने पति को भूखा-प्यासा लटकता नहीं देख सकती। चूँकि न्याय में इस बात की चर्चा नहीं कि वह भूखा-प्यासा रहे, इसलिए वह उसे भोजन तथा पानी देना चाहती है। 

    विक्रम ने पूछा कि अब तक उसने ऐसा किया क्यों नहीं। इस पर औरत बोली कि उसका पति इतनी ऊँचाई पर टँगा हुआ है कि वह बगैर किसी की सहायता के उस तक नहीं पहुँच सकती और राजा के डर से कोई भी दण्डित व्यक्ति की मदद को तैयार नहीं होता। तब विक्रम ने कहा कि वह उनके साथ चल सकती है। दरअसल वह औरत पिशाचिनी की और वह लटकने वाला व्यक्ति उसका पति नहीं था। वह उसे राजा के कन्धे पर चढ़कर खाना चाहती थी। जब विक्रम उस पेड़ के पास आए तो वह उस व्यक्ति को चट कर गई। तृप्त होकर विक्रम को उसने मनचाही चीज़ मांगने को कहा। विक्रम ने कहा वह अन्नपूर्णा प्रदान करे जिससे उनकी प्रजा कभी भूखी नहीं रहे। इस पर वह पिशाचिनी बोली कि अन्नपूर्णा देना उसके बस में नहीं, लेकिन उसकी बहन प्रदान कर सकती है। विक्रम उसके साथ चलकर नदी किनारे आए जहाँ एक झोपड़ी थी। 

    पिशाचिनी के आवाज़ देने पर उसकी बहन बाहर निकली। बहन को उसने राजा का परिचय दिया और कहा कि विक्रमादित्य अन्नपूर्णा के सच्चे अधिकारी है, अत: वह उन्हें अन्नपूर्णा प्रदान करे। उसकी बहन ने सहर्ष अन्नपूर्णा उन्हें दे दी। अन्नपूर्णा लेकर विक्रम अपने महल की ओर रवाना हुए। तब तक भोर हो चुकी थी। रास्ते में एक ब्राह्मण मिला। उसने राजा से भिक्षा में भोजन माँगा। विक्रम ने अन्नपूर्णा पात्र से कहा कि ब्राह्मण को पेट भर भोजन कराए। सचमुच तरह-तरह के व्यंजन ब्राह्मण कि सामने आ गए। जब ब्राह्मण ने पेट भर खाना खा लिया तो राजा ने उसे दक्षिणा देना चाहा। ब्राह्मण अपनी आँखों से अन्नपूर्णा पात्र का चमत्कार देख चुका था, इसलिए उसने कहा- "अगर आप दक्षिणा देना ही चाहते है तो मुझे दक्षिणास्वरुप यह पात्र दे दें, ताकि मुझे किसी के सामने भोजन के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़े।" विक्रम ने बेहिचक उसी क्षण उसे वह पात्र दे दिया। ब्राह्मण राजा को आशीर्वाद देकर चला गया और वे अपने महल लौट गए।
    5 min
  • सिंहासन बत्तीसी: छठी पुतली रविभामा : Ravibhama
    रविभामा
    छठी पुतली रविभामा ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है-

    एक दिन विक्रमादित्य नदी के तट पर बने हुए अपने महल से प्राकृतिक सौन्दर्य को निहार रहे थे। बरसात का महीना था, इसलिए नदी उफन रही थी और अत्यन्त तेज़ी से बह रही थी। इतने में उनकी नज़र एक पुरुष, एक स्री और एक बच्चे पर पड़ी। उनके वस्र तार-तार थे और चेहरे पीले। राजा देखते ही समझ गए ये बहुत ही निर्धन हैं। सहसा वे तीनों उस नदी में छलांग लगा गए। अगले ही पल प्राणों की रक्षा के लिए चिल्लाने लगे। विक्रम ने बिना एक पल गँवाए नदी में उनकी रक्षा के लिए छलांग लगा दी। अकेले तीनों को बचाना सम्भव नहीं था, इसलिए उन्होंने दोनों बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेतालों ने स्री और बच्चे को तथा विक्रम ने उस पुरुष को डूबने से बचा लिया । तट पर पहुँचकर उन्होंने जानना चाहा वे आत्महत्या क्यों कर रहे थे। पुरुष ने बताया कि वह उन्हीं के राज्य का एक अत्यन्त निरधन ब्राह्मण है जो अपनी दरिद्रता से तंग आकर जान देना चाहता है। वह अपनी बीवी तथा बच्चे को भूख से मरता हुआ नहीं देख सकता और आत्महत्या के सिवा अपनी समस्या का कोई अन्त नहीं नज़र आता। 

    इस राज्य के लोग इतने आत्मनिर्भर है#े कि सारा काम खुद ही करते हैं, इसलिए उसे कोई रोज़गार भी नहीं देता। विक्रम ने ब्राह्मण से कहा कि वह उनके अतिथिशाला में जब तक चाहे अपने परिवार के साथ रह सकता है तथा उसकी हर ज़रुरत पूरी की जाएगी। ब्राह्मण ने कहा कि रहने में तो कोई हर्ज नहीं है, लेकिन उसे डर है कि कुछ समय बाद आतिथ्य में कमी आ जाएगी और उसे अपमानित होकर जाना पड़ेगा। विक्रम ने उसे विश्वास दिलाया कि ऐसी कोई बात नहीं होगी और उसे भगवान समझकर उसके साथ हमेशा अच्छा बर्ताव किया जाएगा। विक्रम के इस तरह विश्वास दिलाने पर ब्राह्मण परिवार अतिथिशाला में आकर रहने लगा। उसकी देख-रेख के लिए नौकर-चाकर नियुक्त कर दिए गए। वे मौज से रहते, अपनी मर्ज़ी से खाते-पीते और आरामदेह पलंग पर सोते। किसी चीज़ की उन्हें कमी नहीं थी। लेकिन वे सफ़ाई पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। जो कपड़े पहनते थे उन्हें कई दिनों तक नहीं बदलते। जहाँ सोते वहीं थूकते और मल-मूत्र त्याग भी कर देते। चारों तरफ गंदगी-ही गंदगी फैल गई।

    दुर्गन्ध के मारे उनका स्थान एक पल भी ठहरने लायक नहीं रहा। नौकर-चाकर कुछ दिनों तक तो धीरज से सब कुछ सहते रहे लेकिन कब तक ऐसा चलता? राजा के कोप की भी उन्होंने पहवाह नहीं की और भाग खड़े हुए। राजा ने कई अन्य नौकर भेजे, पर सब के सब एक ही जैसे निकले। सबके लिए यह काम असंभव साबित हुआ। तब विक्रम ने खुद ही उनकी सेवा का बीड़ा उठाया। उठते-बैठते, सोते-जगते वे ब्राह्मण परिवार की हर इच्छा पूरी करते। दुर्गन्ध के मारे माथा फटा जाता, फिर भी कभी अपशब्द का व्यवहार नहीं करते। उनके कहने पर विक्रम उनके पाँव भी दबाते। ब्राह्मण परिवार ने हर सम्भव प्रयत्न किया कि विक्रम उनके आतित्थ से तंग आकर अतिथि-सत्कार भूल जाएँ और अभद्रता से पेश आएँ, मगर उनकी कोशिश असफल रही। बड़े सब्र से विक्रम उनकी सेवा में लगे रहे। कभी उन्हें शिकायत का कोई मौका नहीं दिया। एक दिन ब्राह्मण ने जैसे उनकी परीक्षा लेने की ठान ली। उसने राजा को कहा कि वे उसके शरीर पर लगी विष्ठा साफ करें तथा उसे अच्छी तरह नहला-धोकर साफ़ वस्र पहनाएँ।

    विक्रम तुरन्त उसकी आज्ञा मानकर अपने हाथों से विष्ठा साफ करने को बढ़े। अचानक चमत्कार हुआ। ब्राह्मण के सारे गंदे वस्र गायब हो गए। उसके शरीर पर देवताओं द्वारा पहने जाने वाले वस्र आ गए। उसका मुख मण्डल तेज से प्रदीप्त हो गया। सारे शरीर से सुगन्ध निकलने लगी। विक्रम आश्चर्य चकित थे। तभी वह ब्राह्मण बोला कि दरअसल वह वरुण है। वरुण देव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए यह रुप धरा था। विक्रम के अतिथि-सत्कार की प्रशंसा सुनकर वे सपरिवार यहाँ आओ थे। जैसा उन्होंने सुना था वैसा ही उन्होंने पाया, इसलिए विक्रम को उन्होंने वरदान दिया कि उसके राज्य में कभी भी अनावृष्टि नहीं होगी तथा वहाँ की ज़मीन से तीन-तीन फसलें निकलेंगी। विक्रम को वरदान देकर वे सपरिवार अन्तध्र्यान हो गए।
    6 min
  • सिंहासन बत्तीसी: पाँचवी पुतली लीलावती : Leelavati
    लीलावती
    पाँचवीं पुतली लीलावती ने भी राजा भोज को विक्रमादित्य के बारे में जो कुछ सुनाया उससे उनकी दानवीरता ही झलकती थी। कथा इस प्रकार थी- 

    हमेशा की तरह एक दिन विक्रमादित्य अपने दरबार में राजकाज निबटा रहे थे तभी एक ब्राह्मण दरबार में आकर उनसे मिला। उसने उन्हें बताया कि उनके राज्य की जनता खुशहाल हो जाएगी और उनकी भी कीर्ति चारों तरफ फैल जाएगी, अगर वे तुला लग्न में अपने लिए कोई महल बनवाएँ। विक्रम को उसकी बात जँच गई और उन्होंने एक बड़े ही भव्य महल का निर्माण करवाया। कारीगरों ने उसे राजा के निर्देश पर सोने-चाँदी, हीरे-जवाहरात और मणि-मोतियों से पूरी तरह सजा दिया। महल जब बनकर तैयार हुआ तो उसकी भव्यता देखते बनती थी। विक्रम अपने सगे-सम्बन्धियों तथा नौकर-चाकरों के साथ उसे देखने गए। उनके साथ वह ब्राह्मण भी था। विक्रम तो जो मंत्रमुग्ध हुए, वह ब्राह्मण मुँह खोले देखता ही रह गया। बिना सोचे उसके मुँह से निकला-"काश, इस महल का मालिक मैं होता!" विक्रमादित्य ने उसकी इच्छा जानते ही झट वह भव्य महल उसे दान में दे दिया।

    ब्राह्मण के तो मानो पाँव ही ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह भागता हुआ अपनी पत्नी को यह समाचार सुनाने पहुँचा। इधर ब्राह्मणी उसे खाली हाथ आते देख कुछ बोलती उससे पहले ही उसने उसे हीरे-जवाहरात और मणि-मुक्ताओं से जड़े हुए महल को दान में प्राप्त करने की बात बता दी। ब्राह्मण की पत्नी की तो खुशी की सीमा न रही। उसे एकबारगी लगा मानो उसका पति पागल हो गया और यों ही अनाप-शनाप बक रहा हों, मगर उसके बार-बार कहने पर वह उसके साथ महल देखने के लिए चलने को तैयार हो गई। महल की शोभा देखकर उसकी आँखे खुली रह गईं। महक का कोना-कोना देखते-देखते कब शाम हो गई उन्हें पता ही नहीं चला। थके-माँदे वे एक शयन-कक्ष में जाकर निढाल हो गए। अर्द्ध रात्रि में उनकी आँखे किसी आवाज़ से खुल गई। 

    सारे महल में खुशबू फैली थी और सारा महक प्रकाश मान था। उन्होंने ध्यान से सुना तो लक्ष्मी बोल रही थी। वह कह रही थी कि उनके भाग्य से वह यहाँ आई है और उनकी कोई भी इच्छा पूरी करने को तैयार है। ब्राह्मण दम्पति का डर के मारे बुरा हाल हो गया। ब्राह्मणी तो बेहोश ही हो गई। लक्ष्मी ने तीन बार अपनी बात दुहराई। लेकिन ब्राह्मण ने कुछ नहीं मांगा तो क्रुद्ध होकर चली गई। उसके जाते ही प्रकाश तथआ खुशबू- दोनों गायब। काफी देर बाद ब्राह्मणी को होश आया तो उसने कहा- "यह महल ज़रुर भुतहा है, इसलिए दान में मिला। इससे अच्छआ तो हमारा टूटा-फूटा घर है जहाँ चैन की नींद सो सकते हैं।" ब्राह्मण को पत्नी की बात जँच गई। सहमे-सहमे बाकी रात काटकर तड़के ही उन्होंने अपना सामान समेटा और पुरानी कुटिया को लौट आए। ब्राह्मण अपने घर से सीधा राजभवन आया और विक्रमादित्य से अनुरोध करने लगा कि वे अपना महल वापस ले लें। पर दान दी गई वस्तु को वे कैसे ग्रहण कर लेते। काफी सोचने के बाद उन्होंने महल का उचित मूल्य लगाकरउसे ख़रीद लिया। ब्राह्मण खुशी-खुशी अपने घर लौट गया।

    ब्राह्मण से महल खरीदने के बाद राजा विक्रमादित्य उसमें आकर रहने लगे। वहीं अब दरबार भी लगता था। एक दिन वे सोए हुए थे तो लक्ष्मी फिर आई। जब लक्ष्मी ने उनसे कुछ भी मांगने को कहा तो वे बोले- "आपकी कृपा से मेरे पास सब कुछ है। फिर भी आप अगर देना ही चाहती हैं तो मेरे पूरे राज्य में धन की वर्षा कर दें और मेरी प्रजा को किसी चीज़ की कमी न रहने दें।"

    सुबह उठकर उन्हें पता चला कि सारे राज्य में धन वर्षा हुई है और लोग वर्षा वाला धन राजा को सौंप देना चाहते हैं। विक्रमादित्य ने आदेश किया कि कोई भी किसी अन्य के हिस्से का धना नहीं समेटेगा और अपने हिस्से का धन अपनी सम्पत्ति मानेगा। जनता जय-जय कार कर उठी।
    5 min
  • सिंहासन बत्तीसी: चौथी पुतली कामकंदला : Kamkandla
    कामकंदला
    चौथी पुतली कामकंदला की कथा से भी विक्रमादित्य की दानवीरता तथा त्याग की भावना का पता चलता है। वह इस प्रकार है-

    एक दिन राजा विक्रमादित्य दरबार को सम्बोधित कर रहे थे तभी किसी ने सूचना दी कि एक ब्राह्मण उनसे मिलना चाहता है। विक्रमादित्य ने कहा कि ब्राह्मण को अन्दर लाया जाए। जब ब्राह्मण उनसे मिला तो विक्रम ने उसके आने का प्रयोजन पूछा। ब्राह्मण ने कहा कि वह किसी दान की इच्छा से नहीं आया है, बल्कि उन्हें कुछ बतलाने आया है। उसने बतलाया कि मानसरोवर में सूर्योदय होते ही एक खम्भा प्रकट होता है जो सूर्य का प्रकाश ज्यों-ज्यों फैलता है ऊपर उठता चला जाता है और जब सूर्य की गर्मी अपनी पराकाष्ठा पर होती है तो सूर्य को स्पर्श करता है। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी घटती है छोटा होता जाता है तथा सूर्यास्त होते ही जल में विलीन हो जाता है। विक्रम के मन में जिज्ञासा हुई कि ब्राह्मण का इससे अभिप्राय क्या है। ब्राह्मण उनकी जिज्ञासा को भाँप गया और उसने बतलाया कि भगवान इन्द्र का दूत बनकर वह आया है ताकि उनके आत्मविश्वास की रक्षा विक्रम कर सकें। उसने कहा कि सूर्य देवता को घमण्ड है कि समुद्र देवता को छोड़कर पूरे ब्रह्माण्ड में कोई भी उनकी गर्मी को सहन नहीं कर सकता। 

    देवराज इन्द्र उनकी इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका मानना हे कि उनकी अनुकम्पा प्राप्त मृत्युलोक का एक राजा सूर्य की गर्मी की परवाह न करके उनके निकट जा सकता है। वह राजा आप हैं। राजा विक्रमादित्य को अब सारी बात समझ में आ गई। उन्होंने सोच लिया कि प्राणोत्सर्ग करके भी सूर्य भगवान को समीप से जाकर नमस्कार करेंगे तथा देवराज के आत्मविश्वास की रक्षा करेंगे। उन्होंने ब्राह्मण को समुचित दान-दक्षिणा देकर विदा किया तथा अपनी योजना को कार्य-रुप देने का उपाय सोचने लगे। उन्हें इस बात की खुशी थी कि देवतागण भी उन्हें योग्य समझते हैं। भोर होने पर दूसरे दिन वे अपना राज्य छोड़कर चल पड़े। एकान्त में उन्होंने माँ काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेताल तत्क्षण उपस्थित हो गए। 

    विक्रम को उन्होंने बताया कि उन्हें उस खम्भे के बारे में सब कुछ पता है। दोनों बेताल उन्हें मानसरोवर के तट पर लाए। रात उन्होंने हरियाली से भरी जगह पर काटी और भोर होते ही उस जगह पर नज़र टिका दी जहाँ से खम्भा प्रकट होता। सूर्य की किरणों ने ज्योंहि मानसरोवर के जल को छुआ कि एक खम्भा प्रकट हुआ। विक्रम तुरन्त तैरकर उस खम्भे तक पहुँचे। खम्भे पर ज्योंहि विक्रम चढ़े जल में हलचल हुई और लहरें उठकर विक्रम के पाँव छूने लगीं। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी बढी, खम्भा बढ़ता रहा। दोपहर आते-आते खम्भा सूर्य के बिल्कुल करीब आ गया। तब तक विक्रम का शरीर जलकर बिल्कुल राख हो गया था। सूर्य भगवान ने जब खम्भे पर एक मानव को जला हुआ पाया तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि विक्रम को छोड़कर कोई दूसरा नहीं होगा। उन्होंने भगवान इन्द्र के दावे को बिल्कुल सच पाया। 

    उन्होंने अमृत की बून्दों से विक्रम को जीवित किया तथा अपने स्वर्ण कुण्डल उतारकर उन्हें भेंट कर दिए। उन कुण्डलों की विशेषता थी कि कोई भी इच्छित वस्तु वे कभी भी प्रदान कर देते। सूर्य देव ने अपना रथ अस्ताचल की दिशा में बढ़ाया तो खम्भा घटने लगा। सूर्यास्त होते ही खम्भा पूरी तरह घट गया और विक्रम जल पर तैरने लगे। तैरकर सरोवर के किनारे आए और दोनों बेतालों का स्मरण किया। बेताल उन्हें फिर उसी जगह लाए जहाँ से उन्हें सरोवर ले गए थे। विक्रम पैदल अपने महल की दिशा में चल पड़े। कुछ ही दूर पर एक ब्राह्मण मिला जिसने उनसे वे कुण्डल मांग लिए। विक्रम ने बेहिचक उसे दोनों कुण्डल दे दिए। उन्हें बिल्कुल मलाल नहीं हुआ। 

    5 min
  • सिंहासन बत्तीसी: तीसरी पुतली चंद्रलेखा : Chandralekha
    चन्द्रकला
    तीसरी पुतली चन्द्रकला ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- एक बार पुरुषार्थ और भाग्य में इस बात पर ठन गई कि कौन बड़ा है। पुरुषार्थ कहता कि बगैर मेहनत के कुछ भी सम्भव नहीं है जबकि भाग्य का मानना था कि जिसको जो भी मिलता है भाग्य से मिलता है परिश्रम की कोई भूमिका नहीं होती है। उनके विवाद ने ऐसा उग्र रुप ग्रहण कर लिया कि दोनों को देवराज इन्द्र के पास जाना पड़ा। झगड़ा बहुत ही पेचीदा था इसलिए इन्द्र भी चकरा गए। पुरुषार्थ को वे नहीं मानते जिन्हें भाग्य से ही सब कुछ प्राप्त हो चुका था। दूसरी तरफ अगर भाग्य को बड़ा बताते तो पुरुषार्थ उनका उदाहरण प्रस्तुत करता जिन्होंने मेहनत से सब कुछ अर्जित किया था। असमंजस में पड़ गए और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे। काफी सोचने के बाद उन्हें विक्रमादित्य की याद आई। उन्हें लगा सारे विश्व में इस झगड़े का समाधान सिर्फ वही कर सकते है। 

    उन्होंने पुरुषार्थ और भाग्य को विक्रमादित्य के पास जाने के लिए कहा। पुरुषार्थ और भाग्य मानव भेष में विक्रम के पास चल पड़े। विक्रम के पास आकर उन्होंने अपने झगड़े की बात रखी। विक्रमादित्य को भी तुरन्त कोई समाधान नहीं सूझा। उन्होंने दोनों से छ: महीने की मोहलत मांगी और उनसे छ: महीने के बाद आने को कहा। जब वे चले गए तो विक्रमादित्य ने काफी सोचा। किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके तो उन्होंने सामान्य जनता के बीच भेष बदलकर घूमना शुरु किया। काफी घूमने के बाद भी जब कोई संतोषजनक हल नहीं खोज पाए तो दूसरे राज्यों में भी घूमने का निर्णय किया। काफी भटकने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने एक व्यापारी के यहाँ नौकरी कर ली। व्यापारी ने उन्हें नौकरी उनके यह कहने पर कि जो काम दूसरे नहीं कर सकते हैं वे कर देंगे, दी। 

    कुछ दिनों बाद वह व्यापारी जहाज पर अपना माल लादकर दूसरे देशों में व्यापार करने के लिए समुद्री रास्ते से चल पड़ा। अन्य नौकरों के अलावा उसके साथ विक्रमादित्य भी थे। जहाज कुछ ही दूर गया होगा कि भयानक तूफान आ गया। जहाज पर सवार लोगों में भय और हताशा की लहर दौड़ गई। किसी तरह जहाज एक टापू के पास आया और वहाँ लंगर डाल दिया गया। जब तूफान समाप्त हुआ तो लंगर उठाया जाने लगा। मगर लंगर किसी के उठाए न उठा। अब व्यापारी को याद आया कि विक्रमादित्य ने यह कहकर नौकरी ली थी कि जो कोई न कर सकेगा वे कर देंगे। उसने विक्रम से लंगर उठाने को कहा। लंगर उनसे आसानी से उठ गया। लंगर उठते ही जहाज ऐसी गति से बढ़ गया कि टापू पर विक्रम छूट गए। 

    उनकी समझ में नहीं आया क्या किया जाए। द्वीप पर घूमने-फिरने चल पड़े। नगर के द्वार पर एक पट्टिका टंगी थी जिस पर लिखा था कि वहाँ की राजकुमारी का विवाह विक्रमादित्य से होगा। वे चलते-चलते महल तक पहुँचे। राजकुमारी उनका परिचय पाकर खुश हुई और दोनों का विवाह हो गया। कुछ समय बाद वे कुछ सेवकों को साथ ले अपने राज्य की ओर चल पड़े। रास्ते में विश्राम के लिए जहाँ डेरा डाला वहीं एक सन्यासी से उनकी भेंट हुई। सन्यासी ने उन्हें एक माला और एक छड़ी दी। उस माला की दो विशेषताएँ थीं- उसे पहननेवाला अदृश्य होकर सब कुछ देख सकता था तथा गले में माला रहने पर उसका हर कार्य सिद्ध हो जाता। छड़ी से उसका मालिक सोने के पूर्व कोई भी आभूषण मांग सकता था।

    सन्यासी को धन्यवाद देकर विक्रम अपने राज्य लौटे। एक उद्यान में ठहरकर संग आए सेवकों को वापस भेज दिया तथा अपनी पत्नी को संदेश भिजवाया कि शीघ्र ही वे उसे अपने राज्य बुलवा लेंगे। उद्यान में ही उनकी भेंट एक ब्राह्मण और एक भाट से हुई। वे दोनों काफी समय से उस उद्यान की देखभाल कर रहे थे। उन्हें आशा थी कि उनके राजा कभी उनकी सुध लेंगे तथा उनकी विपन्नता को दूर करेंगे। विक्रम पसीज गए। उन्होंने सन्यासी वाली माला भाट को तथा छड़ी ब्राह्मण को दे दी। ऐसी अमूल्य चीजें पाकर दोनों धन्य हुए और विक्रम का गुणगान करते हुए चले गए। 

    विक्रम राज दरबार में पहुँचकर अपने कार्य में संलग्न हो गए। छ: मास की अवधि पूरी हुई तो पुरुषार्थ तथा भाग्य अपने फैसले के लिए उनके पास आए। विक्रम ने उन्हें बताया कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्हें छड़ी और माला का उदाहरण याद आया। जो छड़ी और माला उन्हें भाग्य से सन्यासी से प्राप्त हुई थीं उन्हें ब्राह्मण और भाट ने पुरुषार्थ से प्राप्त किया। पुरुषार्थ और भाग्य पूरी तरह संतुष्ट होकर वहाँ से चले गए।
    6 min

About Stories of Singhasan Battisi : सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ

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सिंहासन बत्तीसी (संस्कृत:सिंहासन द्वात्रिंशिका, विक्रमचरित) एक लोककथा संग्रह है। प्रजा से प्रेम करने वाले,न्याय प्रिय, जननायक, प्रयोगवादी एवं दूरदर्शी महाराजा विक्रमादित्य भारतीय लोककथाओं के एक बहुत…