पंडित रामधन तिवारी को परमात्मा ने बहुत धन-संपत्ति दी थी, किंतु संतान के बिना उनका घर सूना था। धन धान्य से भरा पूरा घर उन्हें जंगल की तरह जान पड़ता। संतान की लालसा में उन्होंने न जानें कितने जप-तप एवं विधान करवाए और अंत में उनकी ढलती उम्र में पुत्र तो नहीं, किंतु एक पुत्री का जन्म अवश्य हुआ। तिवारी जी ने खूब खुले हाथ से खर्च किया। सारे गाँव को प्रीतिभाज दिया गया। महीनों घर में डोलक ठनकती रही। कन्या ही सही पर इसके जन्म से तिवारी के निःसंतान होने का कलंक धुल गया। कन्या का रंग गोरा - चिट्टा, आँखें बड़ी-बड़ी, चौड़ा माथा और सुंदर-सी नासिका थी। उसका नाम रखा गया सोना। सोना का लालन-पालन बड़े लाड-प्यार से होने लगा।
सोना के सात साल की होने पर तिवारी जी ने घर में एक मास्टर लगाकर सोना को हिंदी पढ़वाना