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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १५वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि रावण के बहुत मानाने और डराने के बावजूद सीताजी ने रावण की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा - जिससे वो बहुत ही दुखी था। यद्यपि रावण समर्थ था, बुद्धिमान था, शिवजी का भक्त था और यह भी सच है की सीताजी के साथ उसने कोई जोर-जबरदस्ती नहीं करी थी, तथापि हिन्दू महिलाओं के चरित्र और मूल्यों पर यहाँ प्रकाश पड़ता है। समबन्धों का आधार धर्म होता है, जिसकी पवित्रता सदैव बनाई रखी जाती है। जो अपने संबंधों को धन, दौलत आदि के तराजू पर तौलते हैं वे व्यभिचारी लोग होते हैं। सीताजी रावण के अनेकों प्रयासों के बावजूद तस-से-मस नहीं होती हैं बल्कि उसको रामजी रुपी सूर्य के सामने मात्र जुगनू तुल्य बताती हैं। इसपर रावण अत्यंत क्रोधित हो जाता है और फिर सीताजी की प्रतिक्रिया देखने योग्य थी। ये आप कथा में सुनिए।
By Vedanta Ashramसुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १५वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि रावण के बहुत मानाने और डराने के बावजूद सीताजी ने रावण की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा - जिससे वो बहुत ही दुखी था। यद्यपि रावण समर्थ था, बुद्धिमान था, शिवजी का भक्त था और यह भी सच है की सीताजी के साथ उसने कोई जोर-जबरदस्ती नहीं करी थी, तथापि हिन्दू महिलाओं के चरित्र और मूल्यों पर यहाँ प्रकाश पड़ता है। समबन्धों का आधार धर्म होता है, जिसकी पवित्रता सदैव बनाई रखी जाती है। जो अपने संबंधों को धन, दौलत आदि के तराजू पर तौलते हैं वे व्यभिचारी लोग होते हैं। सीताजी रावण के अनेकों प्रयासों के बावजूद तस-से-मस नहीं होती हैं बल्कि उसको रामजी रुपी सूर्य के सामने मात्र जुगनू तुल्य बताती हैं। इसपर रावण अत्यंत क्रोधित हो जाता है और फिर सीताजी की प्रतिक्रिया देखने योग्य थी। ये आप कथा में सुनिए।