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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १८वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब सीताजी अत्यंत व्याकुल और वराह की अग्नि में जल रहीं थीं और सबसे और अंततः अशोक वृक्ष से प्रार्थनाकर रहीं थीं की हमको अग्नि की एक चिंगारी दे दो - उस समय हनुमानजी ने रामजी की मुद्रिका उनकी गोद में डाल दी। वो भी इतनी दिव्य और चमकीली थी की मनो अशोक वृक्ष ने उनकी प्रार्थना सुनली और एक अंगारा दे दिया हो। लेकिन जब उन्होंने ध्यान से देखा तब वे आश्चर्य चकित हो गयीं और सोचने लगीं की रामजी तो अजेय हैं और ऐसी मुद्रिका माया से तो बन नहीं सकती है - तो यह यहाँ आयी कैसे? मन में हर्ष और विषाद - दोनों आ रहे थे। उस समय हनुमानजी ने रामजी का गुणगान गाना / कहना प्रारम्भ कर दिया - जो की अत्यंत मधुर लग रहे थे। आगे हनुमानजी का सीताजी के सामने आना और चर्चा करना ये समस्त दिव्य बातें आप स्वयं पू स्वामीजी के वचन सुनें।
By Vedanta Ashramसुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १८वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब सीताजी अत्यंत व्याकुल और वराह की अग्नि में जल रहीं थीं और सबसे और अंततः अशोक वृक्ष से प्रार्थनाकर रहीं थीं की हमको अग्नि की एक चिंगारी दे दो - उस समय हनुमानजी ने रामजी की मुद्रिका उनकी गोद में डाल दी। वो भी इतनी दिव्य और चमकीली थी की मनो अशोक वृक्ष ने उनकी प्रार्थना सुनली और एक अंगारा दे दिया हो। लेकिन जब उन्होंने ध्यान से देखा तब वे आश्चर्य चकित हो गयीं और सोचने लगीं की रामजी तो अजेय हैं और ऐसी मुद्रिका माया से तो बन नहीं सकती है - तो यह यहाँ आयी कैसे? मन में हर्ष और विषाद - दोनों आ रहे थे। उस समय हनुमानजी ने रामजी का गुणगान गाना / कहना प्रारम्भ कर दिया - जो की अत्यंत मधुर लग रहे थे। आगे हनुमानजी का सीताजी के सामने आना और चर्चा करना ये समस्त दिव्य बातें आप स्वयं पू स्वामीजी के वचन सुनें।