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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 34वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब भगवान् हनुमानजी की भूरी-भूरी प्रशंसा कर रहे थे तब हनुमानजी रामजी के चारों में गिर जाते हैं। रामजी ने उन्हें उठाया और अपने गले से लगाया और पास बैठाया, और पूछने लगे की बताओ हनुमान तुमने रावण के द्व्रारा रक्षित लंका को कैसे जलाया। तब हनुमानजी अत्यंत सरलता एवं निरभिमानता से कहते हैं की प्रभु यथार्थ तो यह ही है की हम एक वानर हैं और एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदते रहते हैं। जो कुछ भी वहां हुआ सब आप की कृपा थी। बाद में रामजी को प्रसन्न जानकार उन्होंने अनपायनी भक्ति का वरदान मांग लिया - जो की भगवान् ने एवमस्तु कहकर उन्हें प्रदान कर दिया। उसके बाद रामजी ने सुग्रीव को बुलवाया और उन्हें कहा की अब चलने की तैयारी करें।
By Vedanta Ashramसुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 34वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब भगवान् हनुमानजी की भूरी-भूरी प्रशंसा कर रहे थे तब हनुमानजी रामजी के चारों में गिर जाते हैं। रामजी ने उन्हें उठाया और अपने गले से लगाया और पास बैठाया, और पूछने लगे की बताओ हनुमान तुमने रावण के द्व्रारा रक्षित लंका को कैसे जलाया। तब हनुमानजी अत्यंत सरलता एवं निरभिमानता से कहते हैं की प्रभु यथार्थ तो यह ही है की हम एक वानर हैं और एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदते रहते हैं। जो कुछ भी वहां हुआ सब आप की कृपा थी। बाद में रामजी को प्रसन्न जानकार उन्होंने अनपायनी भक्ति का वरदान मांग लिया - जो की भगवान् ने एवमस्तु कहकर उन्हें प्रदान कर दिया। उसके बाद रामजी ने सुग्रीव को बुलवाया और उन्हें कहा की अब चलने की तैयारी करें।