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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 41वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब विभीषण ने रावण को सीताजी को वापस देने के लिए समझाया और वह बहुत क्रोधित हो गया और विभीषणजी और माल्यवान जी को निकल जाने को कहा। माल्यवानजी तो खुद ही उठ के चले गए, लेकिन विभीषणजी रावण के चरण पकड़ के पुनः निवेदन करने लगे। अंततः रावण ने विभीषण जी को लात मार के कहा की जिनका गुणगान गए रहे हो, उन्ही की शरण में जाओ और अपनी नीति उनको ही बताओ। जब उसने लात मरी, तो भी विभीषणजी ने बोलै की कोई बात नहीं, आप हमारे पिता समान हैं लेकिन जो उचित और कल्याणकारी है आप वो ही करें। जब कुछ बात नहीं बानी तो विभीषण को भी निकल जाना उचित लगा, और आकाशमार्ग से अपने सचिवों के साथ ऊपर उठ गए, और सबको घोषणा करते हुए बोले की आप की सभा काल वश हो गयी है। अब हमको दोष नहीं देना।
By Vedanta Ashramसुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 41वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब विभीषण ने रावण को सीताजी को वापस देने के लिए समझाया और वह बहुत क्रोधित हो गया और विभीषणजी और माल्यवान जी को निकल जाने को कहा। माल्यवानजी तो खुद ही उठ के चले गए, लेकिन विभीषणजी रावण के चरण पकड़ के पुनः निवेदन करने लगे। अंततः रावण ने विभीषण जी को लात मार के कहा की जिनका गुणगान गए रहे हो, उन्ही की शरण में जाओ और अपनी नीति उनको ही बताओ। जब उसने लात मरी, तो भी विभीषणजी ने बोलै की कोई बात नहीं, आप हमारे पिता समान हैं लेकिन जो उचित और कल्याणकारी है आप वो ही करें। जब कुछ बात नहीं बानी तो विभीषण को भी निकल जाना उचित लगा, और आकाशमार्ग से अपने सचिवों के साथ ऊपर उठ गए, और सबको घोषणा करते हुए बोले की आप की सभा काल वश हो गयी है। अब हमको दोष नहीं देना।