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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के पाँचवे दिन पूज्य पाद श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में प्रवेश किया। जाम्बवानजी को गुरु स्थानीय बताते हुए एक अच्छी शिक्षा का स्वरुप बताया। जिस शिक्षा से शिष्य के मन में अपना परिचय, अपने जीवन का उद्देश्य, कार्य में हमारा रोल और सबसे बड़ी बात उसके मन में आत्मा-विश्वास और उत्साह का सृजन हो जाये वो ही शिक्षा उचित और कल्याणकारी होती है। उत्साह और आत्म-विश्वास से भरे हनुमानजी अपने अन्य वानर साथियों के प्रति आत्मीयता और संवेदनशीलता भूलते नहीं है और सबको विश्वास दिलाते हैं की तुम सब हमारी प्रतीक्षा करना और यहाँ रह कर कंद, मूल और फल आदि खाओ - हम सीताजी का समाचार लेकर अवश्य आयेंगें। और वे फिर वहां से प्रभु का स्मरण करते हुए द्रुत गति से भगवान् के बाण की तरह से निकल जाते हैं।
By Vedanta Ashramसुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के पाँचवे दिन पूज्य पाद श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में प्रवेश किया। जाम्बवानजी को गुरु स्थानीय बताते हुए एक अच्छी शिक्षा का स्वरुप बताया। जिस शिक्षा से शिष्य के मन में अपना परिचय, अपने जीवन का उद्देश्य, कार्य में हमारा रोल और सबसे बड़ी बात उसके मन में आत्मा-विश्वास और उत्साह का सृजन हो जाये वो ही शिक्षा उचित और कल्याणकारी होती है। उत्साह और आत्म-विश्वास से भरे हनुमानजी अपने अन्य वानर साथियों के प्रति आत्मीयता और संवेदनशीलता भूलते नहीं है और सबको विश्वास दिलाते हैं की तुम सब हमारी प्रतीक्षा करना और यहाँ रह कर कंद, मूल और फल आदि खाओ - हम सीताजी का समाचार लेकर अवश्य आयेंगें। और वे फिर वहां से प्रभु का स्मरण करते हुए द्रुत गति से भगवान् के बाण की तरह से निकल जाते हैं।