सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 51वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब रामजी ने विभीषणजी आदि से पूछा की आप लोग सलाह दीजिये की समुद्र के उस पार कैसे जाएँ, तो विभीषणजी ने अपनी राय दी की निति तो यह कहती है की पहले प्रेम से निवेदन करना चाहिए और समुद्र तो आपके कुलगुरु हैं। तो रामजी ने कहा की हे मित्र, तुम्हारी राय अच्छी है। लेकिन लक्षणामजी को यह अच्छा नहीं लगा, वे बोले की केवल कमज़ोर और आलसी लोग ही देव अर्थात किस्मत का सहारा लेते हैं। रामजी मुस्कराये और लक्ष्मणजी को समझते हुए बोले की धीरज रखो, ऐसा ही कुछ करेंगें, और फिर समद्र को प्रणाम किया और फिर तट पर आराधना हेतु आसन डाल कर बैठ गए।