सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 52वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब विभीषणजी ने रामजी को यह सलाह दी की सागर आपके कुलगुरु हैं इसलिए नीति यह कहती है की उनसे आदर के साथ मार्ग दिखने के लिए निवेदन करना चाहिए, तो रामजी को यह नीति अच्छी लगी और उन्होंने सागर को सर झुकाके प्रणाम किया और तट पर आराधना हेतु बैठ गए। इस विषय को निमित्त बनाकर पू स्वामीजी ने प्रारब्ध और पुरुषार्थ के विषय पर विस्तृत चर्चा करी। उधर रावण ने विभीषणजी के पीछे एक जासूस भेज दिया था। वो वानर का रूप धारण करके सबसे साथ मिल गया था और उसने सब कुछ देखा की कैसे विभीषणजी को रामजी ने आदर के साथं केवल अपना लिया बल्कि उनका राज-तिलक भी कर दिया। इतना आदर तो उन्हें कभी लंका में भी नहीं मिला था - अतः वो बहुत प्रभावित था, और रामजी का गुणगान गाने लगा, इस कारण उसका कपट के द्वारा धारण किया हुआ रूप गायब हो गया और वो पकड़ा गया। बाद में लक्ष्मणजी ने उसको क्षमा कर दिया और अपनी पटरी और सन्देश देकर रावण के पास भिजवा दिया।