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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 58वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब तीन दिन की आराधना के बाद भी समुद्र देवता प्रकट नहीं हुए तो रामजी नाराज हो गए और बोले की कुछ लोगों में बिना भय प्रीती नहीं होती है। उन्होंने नीति के अनेकानेक वचन कहे जिसका भाव यह ही था की अनधिकारी को ज्ञान, प्रेम आदि निरर्थक हो जाता है। उन्होंने लक्ष्मण को कहा की हमारा धनुष-बाण लाओ। रामजी ने जैसे ही धनुष के ऊपर बाण का संधान किया, समुद्र में अग्नि की ज्वाला उठाने लगी और उसके जीव-जंतु व्याकुल हो गए। तब ही समुद्र देवता ब्राह्मण का रूप धारण करके, हाथ में सोने का थाल और उसके अनेकानेक मणियाँ आदि के साथ रामजी के सामने प्रकट हो गए।
By Vedanta Ashramसुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 58वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब तीन दिन की आराधना के बाद भी समुद्र देवता प्रकट नहीं हुए तो रामजी नाराज हो गए और बोले की कुछ लोगों में बिना भय प्रीती नहीं होती है। उन्होंने नीति के अनेकानेक वचन कहे जिसका भाव यह ही था की अनधिकारी को ज्ञान, प्रेम आदि निरर्थक हो जाता है। उन्होंने लक्ष्मण को कहा की हमारा धनुष-बाण लाओ। रामजी ने जैसे ही धनुष के ऊपर बाण का संधान किया, समुद्र में अग्नि की ज्वाला उठाने लगी और उसके जीव-जंतु व्याकुल हो गए। तब ही समुद्र देवता ब्राह्मण का रूप धारण करके, हाथ में सोने का थाल और उसके अनेकानेक मणियाँ आदि के साथ रामजी के सामने प्रकट हो गए।