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सुन्दरकाण्ड ज्ञान-यज्ञ - 6


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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के छठे दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया की हनुमानजी की लंका की यात्रा एक साधक की भक्ति माता के दर्शन की यात्रा है। किसी भी यात्रा में कोई न कोई अच्छे या बुरे अवरोध आने स्वाभाविक हैं। हनुमानजी को सबसे पहले मैनाक पर्वत मिले। वे उनके पिताजी (पवन देवता) के ऋणी थे, वे पूरी आत्मीयता के साथ हनुमानजी की सेवा के भाव से रस्ते में सामने खड़े हो जाते हैं और उन्हें कुछ देर का विश्राम करने के लिए अपने हरे-भरे पर्वत पर आमंत्रित करते हैं। हनुमानजी उनकी भावना देख कर बड़ी आत्मीयता से उनकी सेवा स्वीकारते हुए मात्र उनके द्वारा दिए गए फल-फूलों को स्पर्श करते हुए कहते हैं की हमें अभी कोई थकावट नहीं  है, वस्तुतः हम जब अपने प्रभु श्री राम जी का कार्य पूरा कर लेंगें तभी विश्राम लेंगे। 

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Vedanta Ashram PodcastsBy Vedanta Ashram