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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया की हनुमानजी ने बड़ी आत्मीयता से मैनाक के आतिथ्य को स्वीकारते हुए लेकिन बिना रुके आगे चले। आगे उन्हें देवताओं के द्वारा भेजी गयी सुरसा मिली। वो बड़ी प्रसन्नता से कहती है की वाह ! आज तो हमें देवताओं ने बड़ा ही सूंदर भोजन भेजा है। हनुमानजी ने उससे निवेदन किया की हे माता, इस समय हम रामजी के काम से जा रहे हैं, अभी हमें जाने दो, मैं वचन देता हूं की काम पूरा करके मैं आपके पास अवश्य वापस आ जाऊँगा तब हमें खा लेना। लेकिन जब उसने जाने नहीं दिया तो हनुमानजी ने कहा तो खा क्यों नहीं लेती हो? तब जो हुआ उसने सुरसा को केवल आश्चर्यचकित ही नहीं किया बल्कि स्तब्ध कर दिया और अंततः इस व्यवधान को वे अत्यंत बुद्धिमत्ता से अपने लिए आशीर्वाद बनाकर आगे चले।
By Vedanta Ashramसुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया की हनुमानजी ने बड़ी आत्मीयता से मैनाक के आतिथ्य को स्वीकारते हुए लेकिन बिना रुके आगे चले। आगे उन्हें देवताओं के द्वारा भेजी गयी सुरसा मिली। वो बड़ी प्रसन्नता से कहती है की वाह ! आज तो हमें देवताओं ने बड़ा ही सूंदर भोजन भेजा है। हनुमानजी ने उससे निवेदन किया की हे माता, इस समय हम रामजी के काम से जा रहे हैं, अभी हमें जाने दो, मैं वचन देता हूं की काम पूरा करके मैं आपके पास अवश्य वापस आ जाऊँगा तब हमें खा लेना। लेकिन जब उसने जाने नहीं दिया तो हनुमानजी ने कहा तो खा क्यों नहीं लेती हो? तब जो हुआ उसने सुरसा को केवल आश्चर्यचकित ही नहीं किया बल्कि स्तब्ध कर दिया और अंततः इस व्यवधान को वे अत्यंत बुद्धिमत्ता से अपने लिए आशीर्वाद बनाकर आगे चले।