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दोपहर का समय है, धूप तेज होती जा रही है। सिद्धेश्वरी को अपने तीन बेटों और पति के भोजन का ख़याल करना है।
1921 में 'हंस' द्वारा छपी गई बूढ़ी काकी उम्र के आख़िरी कगार पर खड़ी एक बुजुर्ग महिला की बाहरी और भीतरी दुनिया के बीच बढ़ते फ़ासले की तस्वीर बुनती है।
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