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स्वर सुनकर माँ से ही
तो हम मातृभाषा सीखते हैं।
‘अबोध बालक’ से बड़े हो जाने की पदवी पाते हैं !
जैसा सुनते हैं, वैसे ही बनते जाते हैं।
स्वर हमारे व्यक्तित्व की पहचान है।
एक साथ स्वर मिले जानकर
अशांत मन कैसा ठौर पता है !
लेकिन स्वर के हर शब्द को
अपनाना कितना कठिन है।
तो उसे बदल पाना भी बहुत कठिन है !
और स्वर से ही बनी सरगम !
संगीत का साम-स्वर कितना सुखद लगता है !
जिव्हा जैसा स्वाद पाती है ,
नाक जैसे सूंघता है,
त्वचा जैसे महसूस करती है
एक स्वर से दूसरा स्वर बनता है ,
और प्रकृति ही ईश्वर है !
साम स्वर दे सकें
यदि हम तो देखो !
By Ashwani Kapoorस्वर सुनकर माँ से ही
तो हम मातृभाषा सीखते हैं।
‘अबोध बालक’ से बड़े हो जाने की पदवी पाते हैं !
जैसा सुनते हैं, वैसे ही बनते जाते हैं।
स्वर हमारे व्यक्तित्व की पहचान है।
एक साथ स्वर मिले जानकर
अशांत मन कैसा ठौर पता है !
लेकिन स्वर के हर शब्द को
अपनाना कितना कठिन है।
तो उसे बदल पाना भी बहुत कठिन है !
और स्वर से ही बनी सरगम !
संगीत का साम-स्वर कितना सुखद लगता है !
जिव्हा जैसा स्वाद पाती है ,
नाक जैसे सूंघता है,
त्वचा जैसे महसूस करती है
एक स्वर से दूसरा स्वर बनता है ,
और प्रकृति ही ईश्वर है !
साम स्वर दे सकें
यदि हम तो देखो !