तो हम मातृभाषा सीखते हैं।
‘अबोध बालक’ से बड़े हो जाने की पदवी पाते हैं !
स्वर ही तो ज्ञान का भंडार है!
जैसा सुनते हैं, वैसे ही बनते जाते हैं।
स्वर हमारे व्यक्तित्व की पहचान है।
अशांत मन कैसा ठौर पता है !
सुनने में बहुत आसान लगता है
तो उसे बदल पाना भी बहुत कठिन है !
--- स्वर से बनी मातृभाषा
स्वर ही ईश्वर है !
स्वर ने दिया हर नए धर्म को जन्म !
स्वर ही करता दो भावों का संगम !
स्वर ने ही छेड़ा महासंग्राम
कितनी सुंदर लगती है सरगम !
संगीत का साम-स्वर कितना सुखद लगता है !
ऐसे में कान जो सुनते हैं,
जिव्हा जैसा स्वाद पाती है ,
वैसा ही मन समझना शुरू कर देता है !
एक स्वर से दूसरा स्वर बनता है ,
और इन सब स्वरों से यह प्रकृति
प्रकृति ही स्वर लहरी है
ऐसे में स्वर ही ईश्वर है।