Pratidin Ek Kavita

Tabdili | Akhtarul Iman


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तब्दीली | अख़्तरुल ईमान


इस भरे शहर में कोई ऐसा नहीं

जो मुझे राह चलते को पहचान ले


और आवाज़ दे ओ बे ओ सर-फिरे

दोनों इक दूसरे से लिपट कर वहीं


गिर्द-ओ-पेश और माहौल को भूल कर

गालियाँ दें हँसें हाथा-पाई करें


पास के पेड़ की छाँव में बैठ कर

घंटों इक दूसरे की सुनें और कहें


और इस नेक रूहों के बाज़ार में

मेरी ये क़ीमती बे-बहा ज़िंदगी


एक दिन के लिए अपना रुख़ मोड़ ले


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Pratidin Ek KavitaBy Nayi Dhara Radio