Pratidin Ek Kavita

Vardaan Mangunga Nahi | Shivmangal Singh Suman


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वरदान माँगूँगा नहीं। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’


यह हार एक विराम है

जीवन महासंग्राम है

तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं ।

वरदान माँगूँगा नहीं ।।


स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए

अपने खण्डहरों के लिए

यह जान लो मैं विश्‍व की सम्पत्ति चाहूँगा नहीं ।

वरदान माँगूँगा नहीं ।।


क्‍या हार में क्‍या जीत में

किंचित नहीं भयभीत मैं

संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही ।

वरदान माँगूँगा नहीं ।।


लघुता न अब मेरी छुओ

तुम हो महान बने रहो

अपने हृदय की वेदना मैं व्‍यर्थ त्‍यागूँगा नहीं ।

वरदान माँगूँगा नहीं ।।


चाहे हृदय को ताप दो

चाहे मुझे अभिशाप दो

कुछ भी करो कर्त्तव्य पथ से किन्तु भागूँगा नहीं ।

वरदान माँगूँगा नहीं ।।

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