Pratidin Ek Kavita

Yugm | Vivek Nirala


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युग्म | विवेक निराला 

  

एक समय में रहे होंगे कम-से-कम-दो 

जितने कि आवश्यक हैं सृष्टि के लिए।


दो आवाज़ें भी रही होंगी कम-से-कम 

एक सन्नाटे की 

एक अँधेरे की।


अँधेरा भी दो तरह का 

रहा होगा अवश्य 

एक भीतर का 

दूसरा बाहर का।


जल-थल 

सर्दी-गर्मी 

दिन-रात 

युग्म में ही रहा होगा जीवन

सुख-दुख से भरा हुआ।


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Pratidin Ek KavitaBy Nayi Dhara Radio