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युग्म | विवेक निराला
एक समय में रहे होंगे कम-से-कम-दो
जितने कि आवश्यक हैं सृष्टि के लिए।
दो आवाज़ें भी रही होंगी कम-से-कम
एक सन्नाटे की
एक अँधेरे की।
अँधेरा भी दो तरह का
रहा होगा अवश्य
एक भीतर का
दूसरा बाहर का।
जल-थल
सर्दी-गर्मी
दिन-रात
युग्म में ही रहा होगा जीवन
सुख-दुख से भरा हुआ।
By Nayi Dhara Radioयुग्म | विवेक निराला
एक समय में रहे होंगे कम-से-कम-दो
जितने कि आवश्यक हैं सृष्टि के लिए।
दो आवाज़ें भी रही होंगी कम-से-कम
एक सन्नाटे की
एक अँधेरे की।
अँधेरा भी दो तरह का
रहा होगा अवश्य
एक भीतर का
दूसरा बाहर का।
जल-थल
सर्दी-गर्मी
दिन-रात
युग्म में ही रहा होगा जीवन
सुख-दुख से भरा हुआ।