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नमस्कार दोस्तों, स्वागत है 'अभिव्यक्ति' में।
पिछले लगभग दस सालों से मैं हिंदी किताबें पढ़ रहा हूँ और इस साहित्य से प्यार हो गया है। शिवानी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, हिमांशु जोशी, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, भगवतीचरण वर्मा जैसे लेखकों को पढ़ने के बाद, मैं हिंदी साहित्य की गहराइयों में और भी खो गया हूँ।
'अभिव्यक्ति' मेरे लिए एक कोशिश है कि इन अनमोल रचनाओं को सहेजकर रखा जा सके, ताकि जब मेरी बेटी वेदांशी/गुंगुन इस दुनिया को खोजना चाहे, तो उसके पास कुछ निशानियाँ हों, जिनका वह पीछा कर सके। आज की कड़ी में मैं आपसे बात करने वाला हूँ राही मासूम रज़ा के उपन्यास टोपी शुक्ला की। यह समाज और साम्प्रदायिकता पर एक तीखा व्यंग्य है, और अंत में मैं इस उपन्यास से कुछ अंश आपके साथ साझा करूंगा, तो बने रहिए मेरे साथ।
आज मैं आपसे एक ऐसे उपन्यास की बात करना चाहता हूँ, जो भले ही ज़्यादा चर्चा में न रहा हो, लेकिन उसकी गहराई और सामयिकता बेहद ज़रूरी है। यह उपन्यास है टोपी शुक्ला ।
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नमस्कार दोस्तों, स्वागत है 'अभिव्यक्ति' में।
पिछले लगभग दस सालों से मैं हिंदी किताबें पढ़ रहा हूँ और इस साहित्य से प्यार हो गया है। शिवानी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम…
'अभिव्यक्ति' मेरे लिए एक कोशिश है कि इन अनमोल रचनाओं को सहेजकर रखा जा सके, ताकि जब मेरी बेटी वेदांशी/गुंगुन इस दुनिया को खोजना चाहे, तो उसके पास कुछ निशानियाँ हों, जिनका वह पीछा कर सके। आज की कड़ी में मैं आपसे बात करने वाला हूँ राही मासूम रज़ा के उपन्यास टोपी शुक्ला की। यह समाज और साम्प्रदायिकता पर एक तीखा व्यंग्य है, और अंत में मैं इस उपन्यास से कुछ अंश आपके साथ साझा करूंगा, तो बने रहिए मेरे साथ।