अध्याय – 12 मसीह के द्वारा उद्धार
मसीही विश्वास संसार के सब धर्मों से इस रूप में अलग है कि सभी धर्म और धर्म-शिक्षक, मनुष्यों को उन नियमों या उपदेशों की शिक्षा देते हैं जिनका पालन उन्हें इस संसार में या आने वाले संसार में प्रसन्न रहने के लिए करना चाहिए; और वे मनुष्यों से आग्रह करते हैं कि इन शिक्षाओं पर चलने के लिए स्वयं को अनुशासित करें। जहाँ तक मसीहियों का प्रश्न है वे यह विश्वास करते हैं कि सब लोग यह अच्छी तरह से जानते हैं कि उन्हें किन शिक्षाओं का पालन करना चाहिए, इसलिए उन्हें और शिक्षाओं की ज़रूरत नहीं है, परन्तु वास्तव में वे इतने बुरे हैं कि न तो वे परमेश्वर के नियमों का पालन कर सकते हैं और न ही करना चाहते हैं।
मनुष्य-जाति की घोर चरित्रहीनता तथा आशाहीन पापमय दशा के कारण, स्वयं परमेश्वर ने यीशु को भेजा कि वह मनुष्यों के बदले उनका विकल्प बन कर उनका पाप दूर करे।
इस कार्य को यीशु ने क्रूस पर पूरा किया। वहाँ पर जब उसे ठुकराकर उसका मज़ाक उड़ाया जा रहा था, वह मनुष्यों के पाप का साकार मानवीय रूप बन गया और मनुष्य-जाति के विरुद्ध परमेश्वर के प्रकोप और न्याय का लक्ष्य बन गया।
अब पाप, अर्थात् मनुष्यजाति के सारे पाप का मूल्य यीशु ने चुका दिया है। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह एक पापी के रूप में अपनी दशा को समझे, अपने आप को बचाने में अपनी असमर्थता को पहचाने, और यीशु मसीह को अपने व्यक्तिगत उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करे। परमेश्वर दुष्ट लोगों को भी धर्मी ठहराता है, जब वे विश्वास के द्वारा यीशु मसीह को अपना एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं। परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक जन व्यक्तिगत रूप से यह निर्णय ले। सिर्फ़ इतना ही नहीं, परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि जो कोई यीशु पर विश्वास करता और परमेश्वर के वचन पर भरोसा रखता है कि यीशु की मृत्यु के द्वारा उस के पापों की क्षमा हुई हैं; परमेश्वर उसे अपना आत्मा प्रदान करेगा। इसका अर्थ यह है कि उसका आत्मा उस पर विश्वास करनेवालों में निवास करेगा और वे नए मनुष्य—नई सृष्टि बन जाएंगे। वे उसके राज्य में नए दिल के साथ जन्म लेते हैं और उनकी शक्ति और इच्छा दोनों धर्मी हो जाती हैं।
यही ‘सुसमाचार’—‘शुभ सन्देश, आगामी अध्याय का विषय है जिस में यीशु के शिष्य पौलुस के लेखों के कुछ अंश लिए गए हैं।