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अध्याय – 9 मृत्यु पर विजय
मसीही सन्देश की सामर्थ्य, महिमा और आशा यीशु का पुनरुत्थान है। और हालाँकि बहुत से लोग इसकी उपेक्षा भी करते हैं, फिर भी, जब तक कि कोई पूरी तरह से अनजान न हो, इस सच्चाई का इनकार नहीं कर सकता। यह संसार के इतिहास का केन्द्र हैं; इसने सारी दुनिया को उलटा-पुलटा कर दिया है। वास्तव में, यही वह सन्देश हैं जिसे मसीही लोग दुनिया को दे रहे हैं, और उन्हें देना भी चाहिए। यीशु मृतकों में से जी उठा! और जब हमारा प्रतिनिधि जी उठा, तो हम भी जी उठेंगे और अनन्त और महिमामय स्वर्ग राज्य में प्रवेश करेंगे! यह समस्त मनुष्य जाति के सिर पर मण्डराते उस मृत्यु के भयंकर श्राप का बहुत ही शक्तिशाली और एक मात्र उत्तर है। इसके अतिरिक्त सारे संसार में कहीं भी मृत्यु पर कोई और विजय तथा कोई और आशा नहीं है।
अध्याय – 10 समय निकट है
यीशु के स्वर्ग पर उठा लिए जाने के बाद, उस पर विश्वास करनेवालों के विरुद्ध हिंसात्मक सताव आरम्भ हो गया। यीशु के शिष्य यूहन्ना को जो यह बताता था कि यीशु ही मसीह है और परमेश्वर के सन्देश का प्रचार किया करता था, उसे काले पानी की सज़ा देकर भूमध्य सागर में पतमुस नाम के टापू पर भेज दिया गया था। वहाँ परमेश्वर ने उसे दर्शन में वे बातें दिखाईं जो आनेवाले दिनों में पृथ्वी पर होने वाली हैं। युगों से, ये बातें उनके लिए जो यीशु मसीह पर अपने विश्वास के कारण दुःख भोगते और यातनाएँ सहते हैं, आनन्द और उत्साह का स्रोत रही हैं। यहाँ यह प्रतिज्ञा दी गई है कि परमेश्वर उनको प्रतिफल देगा जो उसकी आज्ञा मानते हैं, और तब निश्चय ही एक नई दुनिया होगी जहाँ फिर न कोई दुःख होगा और न शोक। परमेश्वर के इन वचनों को “यूहन्ना का प्रकाशन” कहते हैं।
अध्याय – 11 संसार का अन्त और एक नई आशा
पहली शताब्दी के अन्तिम भाग में यीशु के शिष्य और वे सब, जिन्होंने उस पर विश्वास किया था, उस के सन्देश को (जिसे उन्होंने “सुसमाचार,” या “शुभ सन्देश” कहा) सम्पूर्ण संसार में जहाँ कहीं वे जा सकते थे, ले गए। यीशु के शिष्यों ने नए विश्वासियों को, जो संसार के विभिन्न भागों में रहते थे, प्रोत्साहित करने के लिए और उनके विश्वास को दृढ़ बनाने के लिए बहुत से पत्र लिखे थे। यीशु के शिष्यों के इन पत्रों के द्वारा परमेश्वर का वचन मनुष्यों को दिया गया और वह हमारे पास 21 पत्रियों के माध्यम से पहुँचाया गया। इस पुस्तक में अध्याय 11 से अध्याय 14 तक हम ने इन्हीं पत्रियों में से कुछ अंश प्रस्तुत किए हैं।
अध्याय – 12 मसीह के द्वारा उद्धार
मसीही विश्वास संसार के सब धर्मों से इस रूप में अलग है कि सभी धर्म और धर्म-शिक्षक, मनुष्यों को उन नियमों या उपदेशों की शिक्षा देते हैं जिनका पालन उन्हें इस संसार में या आने वाले संसार में प्रसन्न रहने के लिए करना चाहिए; और वे मनुष्यों से आग्रह करते हैं कि इन शिक्षाओं पर चलने के लिए स्वयं को अनुशासित करें। जहाँ तक मसीहियों का प्रश्न है वे यह विश्वास करते हैं कि सब लोग यह अच्छी तरह से जानते हैं कि उन्हें किन शिक्षाओं का पालन करना चाहिए, इसलिए उन्हें और शिक्षाओं की ज़रूरत नहीं है, परन्तु वास्तव में वे इतने बुरे हैं कि न तो वे परमेश्वर के नियमों का पालन कर सकते हैं और न ही करना चाहते हैं।
मनुष्य-जाति की घोर चरित्रहीनता तथा आशाहीन पापमय दशा के कारण, स्वयं परमेश्वर ने यीशु को भेजा कि वह मनुष्यों के बदले उनका विकल्प बन कर उनका पाप दूर करे।
इस कार्य को यीशु ने क्रूस पर पूरा किया। वहाँ पर जब उसे ठुकराकर उसका मज़ाक उड़ाया जा रहा था, वह मनुष्यों के पाप का साकार मानवीय रूप बन गया और मनुष्य-जाति के विरुद्ध परमेश्वर के प्रकोप और न्याय का लक्ष्य बन गया।
अब पाप, अर्थात् मनुष्यजाति के सारे पाप का मूल्य यीशु ने चुका दिया है। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह एक पापी के रूप में अपनी दशा को समझे, अपने आप को बचाने में अपनी असमर्थता को पहचाने, और यीशु मसीह को अपने व्यक्तिगत उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करे। परमेश्वर दुष्ट लोगों को भी धर्मी ठहराता है, जब वे विश्वास के द्वारा यीशु मसीह को अपना एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं। परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक जन व्यक्तिगत रूप से यह निर्णय ले। सिर्फ़ इतना ही नहीं, परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि जो कोई यीशु पर विश्वास करता और परमेश्वर के वचन पर भरोसा रखता है कि यीशु की मृत्यु के द्वारा उस के पापों की क्षमा हुई हैं; परमेश्वर उसे अपना आत्मा प्रदान करेगा। इसका अर्थ यह है कि उसका आत्मा उस पर विश्वास करनेवालों में निवास करेगा और वे नए मनुष्य—नई सृष्टि बन जाएंगे। वे उसके राज्य में नए दिल के साथ जन्म लेते हैं और उनकी शक्ति और इच्छा दोनों धर्मी हो जाती हैं।
यही ‘सुसमाचार’—‘शुभ सन्देश, आगामी अध्याय का विषय है जिस में यीशु के शिष्य पौलुस के लेखों के कुछ अंश लिए गए हैं।
अध्याय – 13 प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने वालों के लिए
बाइबल में हम पाते हैं कि मसीही होने का अर्थ यह नहीं हैं कि किसी धार्मिक संस्था का हो जाना, या किसी नेता या बातों में निपुण शिक्षक के पीछे चलने लगना। वास्तव में हमें तो प्रभु यीशु के द्वारा कड़ी चेतावनी दी गई है कि ऐसी बातों से दूर रहें। जब हम से प्रेरितों के द्वारा मसीहियों को लिखे गए पत्र पढ़ते हैं, तो पाते हैं कि वे हमसे आग्रह करते हैं कि हमें परमेश्वर के वचन में बने रहकर पवित्र जीवन जीना है, संसार की लालसाओं और परीक्षाओं से रहना है, कठिनाई और यहाँ तक कि अत्याचार भी सहना है, और परमेश्वर के शीघ्र आनेवाले राज्य में अनन्त जीवन की आशा करते हुए आनन्द के साथ रहना है, और इन सबसे बढ़कर, अपने उन भाइयों और बहनों से प्रेम करना है जो यीशु से प्रेम करते हैं, तथा उनकी सहायता करनी है।
अध्याय – 14 प्रेम
एक मसीही की सच्ची पहचान ज्ञान नहीं है, वाक्पटुता भी नहीं हैं, शक्ति और वैभवता भी नहीं है, मसीहियों में बहुत ऊँचा पद या सम्मान पाना भी नहीं है, एक मसीही की सच्ची पहचान यह है कि वह अपने भाइयों और बहनों से बहुत उत्साह के साथ और पूरे दिल से प्यार करता है। 1 यूहन्ना 3:23 में हम यह लिखा पाते हैं: “परमेश्वर की यह आज्ञा है कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें, और जैसी उसने हमें आज्ञा दी है वैसे ही आपस में प्रेम रखें।” इस छोटे से अध्याय में हम प्रेम की सच्ची परिभाषा पाते हैं—कुछ ऐसी जो दुनिया के किसी भी साहित्य में नहीं मिल सकती। जिसके पास यह प्रेम है, वही एक सच्चा मसीही है।
अध्याय – 15 बुद्धि का उद्गम
हमें बाइबल में बताया गया है कि परमेश्वर ने राजा सुलेमान को (जिसने इस्राएल पर 1070–1030 ईसा पूर्व में राज्य किया) असीम बुद्धि और समझने की शक्ति दी जो समुद्र के किनारे की रेत के कणों के समान अनगिनत थी। बाइबल बताती है कि “सुलेमान की बुद्धि पूर्व देश के सारे लोगों से बढ़कर थी; वह किसी भी मनुष्य से अधिक बुद्धिमान था। संसार के जो भी राजा उसकी बुद्धि की कीर्त्ति सुनते थे वे अपने लोगों को उसकी बुद्धि की बातें सुनने के लिए भेजा करते थे।” इस छोटे से अध्याय में हमने बाइबल से सुलेमान के कुछ नीतिवचन लिए हैं। ये नीतिवचन लगभग 3000 वर्ष पूर्व लिखे गए थे। संसार में आज भी लोग इनका प्रयोग करते हैं।
अध्याय – 16 भजन और प्रार्थनाएँ
बाइबल में दिए गए भजन मूल रूप से गाने के लिए लिखे गए हैं। यहाँ परमेश्वर हमें सिखा रहा है कि हमें उसके लिए हर समय गाना चाहिए, चाहे हम दुखी हों, चाहे प्रसन्न हों, चाहे बीमार हों, या जब हम असफल होकर पाप कर बैठे, जब हम मुसीबत में पड़ते हों, जब हम सताए जाते हों, जब हम उसकी आशिषों के लिए आभारी और आनन्द से भरे हों, जब हम धनवान हों, और जब हम निर्धनता और आवश्यकता में पड़े हुए हों। मसीही लोग अपने परमेश्वर के लिए भजन गाने में अन्य लोगों से बिलकुल अनोखे हैं। भजन हमें यह भी सिखाते हैं कि कैसे प्रार्थना करना है और क्या प्रार्थना करना है। ये वे प्रार्थनाएँ हैं जो मसीही लोग अपने “स्वर्गिक पिता” से युगों से करते आ रहे हैं। इनमें से कई भजन तो लगभग 3000 वर्ष पूर्व लिखे गए थे।
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