दर्पण की श्रृंखला में यह मेरी पांचवी कहानी है। अक्सर हम भूल जाते हैं कि हर बच्चे की क्षमता उसकी योग्यता दूसरे से भिन्न है। एक दूसरे से तुलना उसमें हीन भावना उत्पन्न करती है। बच्चा चाहे साधारण योग्यता का हो या विलक्षण बुद्धि का, माता पिता का प्यार, रिश्ता दोनों के लिए ही एक सा ही रहना चाहिए। यह कहानी एक पिता के झूठे अभिमान की है जिसने उसे अपने इकलौते पुत्र से दूर कर दिया। तो चलिए सुनते हैं कहानी- पश्चाताप