नमस्कार दोस्तों, ’एक गीत सौ अफ़साने’ की एक और कड़ी के साथ हम फिर हाज़िर हैं। फ़िल्म और ग़ैर-फ़िल्म-संगीत की रचना प्रक्रिया और उनके विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित रोचक प्रसंगों, दिलचस्प क़िस्सों और यादगार घटनाओं
को समेटता है ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का यह साप्ताहिक स्तम्भ। विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारियों और हमारे शोधकार्ताओं के निरन्तर खोज-बीन से इकट्ठा किए तथ्यों से परिपूर्ण है ’एक गीत सौ अफ़साने’ की यह श्रॄंखला।
आज के अंक के लिए हमने चुना है वर्ष 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ का गीत "मैं ख़ुश होना चाहूँ, ख़ुश हो ना सकूँ"। के.
सी. डे, सुप्रभा सरकार, पारुल घोष, हरिमती दुआ और साथियों की आवाज़ें, पंडित सुदर्शन के बोल और आर. सी. बोराल का संगीत। कैसे शुरू हुआ भारत में प्लेबैक सिंगिंग का सिलसिला? इस गीत में ऐसी कौन सी आवश्यकता आन पड़ी थी प्लेबैक तकनीक को लागू करने की? इस गीत के चार प्रमुख गायकों में किस गायक की आवाज़ को विशुद्ध रूप से प्लेबैक कहा जा सकता है? कैसे यह गीत असल में दो गीतों का संगम है? गीतकार पंडित सुदर्शन को कैसे इस फ़िल्म में गीत लिखने
के मौके मिले? जानिए गायिका सुप्रभा सरकार के बारे में भी। ये सब आज के इस अंक में।