नमस्कार दोस्तों, ’एक गीत सौ अफ़साने’ श्रृंखला में पिछले सप्ताह हमने अपने इस सुरीले सफ़र का प्रथम मील का पत्थर, यानी कि सौ-वाँ एपिसोड पूरा किया। पर यह सफ़र अभी बहुत लम्बा है दोस्तों। और इसमें कई और और ऊंचे मुकाम हासिल किए जायेंगे, ऐसी हमारी कोशिश रहेगी। और इस कोशिश में, इस सफ़र में, आप सब हमारे हमसफ़र बने रहेंगे, ऐसी हम उम्मीद करते हैं। तो चलिए 101-वी कड़ी से इस सफ़र को अब आगे बढ़ाया जाए! हम हाज़िर हैं ’एक गीत सौ अफ़साने’ की एक और कड़ी लेकर। फ़िल्म-संगीत की रचना प्रक्रिया और विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित रोचक प्रसंगों, दिलचस्प क़िस्सों और यादगार घटनाओं को समेटता है ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का यह साप्ताहिक स्तम्भ। विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारियों और हमारे शोधकार्ताओं के निरन्तर खोज-बीन से इकट्ठा किए तथ्यों से परिपूर्ण है ’एक गीत सौ अफ़साने’ की यह श्रॄंखला। क्योंकि आज एक नई शुरुआत है, तो क्यों ना शुरू से शुरू की जाए! जी हाँ, आज के अंक के लिए हमने चुना है हिन्दी फ़िल्म संगीत इतिहास का वह गीत जिसे प्रथम फ़िल्मी गीत होने का गौरव प्राप्त है। वर्ष 1931 की पहली सवाक फ़िल्म ’आलम आरा’ का यह गीत है"दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे ताक़त है गर देने की"। वज़ीर मोहम्मद ख़ान की आवाज़, अरदेशर ईरानी के बोल, तथा फ़िरोज़शाह मिस्त्री और बी. ईरानी का संगीत।’आलम आरा’ की कहानी के किस मोड़ पर यह गीत आता है और यह हमें क्या सीख दे जाता है? इस गीत के, बल्कि इस पूरी फ़िल्म की शूटिंग और रेकॉर्डिंग से सम्बन्धित कैसी जानकारी अरदेशर ईरानी ने एक साक्षात्कार में दी है? ’आलम आरा’ की प्रिण्ट ना होने के बावजूद वज़ीर मोहम्मद ख़ान की आवाज़ में यही गीत हम किन दो और फ़िल्मों में सुन सकते हैं? इस फ़िल्म की स्वर्णजयन्ती के उपलक्ष्य पर आयोजित विशेष फ़िल्म समारोह में प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी की उपस्थिति में किस गायक ने यह गीत गा कर प्रस्तुत किया? इस फ़िल्म के80 वर्ष पूर्ति पर ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ ने इस गीत को किस तरह की श्रद्धांजलि अर्पित की? ये सब आज के इस अंक में।