Episode #6: Rajeshwari Rathore मीराबाई का जीवन परिचय एवं साहित्य परिचय के बारे में
मीराबाई का जन्म सन 1498 ईस्वी के लगभग राजस्थान में मेड़ता के पास चौकड़ी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम रतन सिंह था तथा वे जोधपुर संस्थापक राव जोधा की पर प्रपोत्री थी।बचपन में ही हूं की माता का निधन हो गया था अतः वह अपने पिता में राव दूदाजी के पास रहती थी। प्रारंभिक शिक्षा भी उन्होंने दादाजी के पास रहकर ही प्राप्त की थी। राव दूदाजी बड़े ही धार्मिक व उदार प्रवृत्ति के थे l जिसका प्रभाव मीरा के जीवन पर पूर्ण रूप से पड़ा था। बचपन से ही मीराबाई कृष्ण की आराधिका थी। उनका विवाह उदयपुर के राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। साहित्य परिचय मीरा बचपन से ही कृष्ण की भक्त थी। गोपियों की भांति मीरा माधुरी भाव से कृष्ण की उपासना करती थी। वे कृष्ण को ही अपना पति कहती थी। और लोक लाज खोकर कृष्ण के प्रेम में लीन रहती थी।
रचनाएं मीराबाई ने भगवान श्री कृष्ण के प्रेम में अनेक भावपूर्ण पदों की रचना की है संकलन विभिन्न नामों से प्रकाशित हुए हैं। नरसी जी का मायरा, रामगोविंद, राग सिरठ के पद ,गीत गोविंद की टीका मीराबाई की रचनाएं हैं।
काव्य शैली या भाषा शैली मीराबाई के काव्य में उनके हृदय की सरलता तरलता तथा निश्चिंता स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। मीराबाई ने गीत काव्य की रचना की तथा उन्होंने कृष्ण भक्त कवियों की परंपरागत पद शैली को अपनाया मीराबाई के सभी पद संगीत के स्वरों में बंधे हुए हैं। उनके गीतों में उनकी आवेश पूर्ण आत्मा अभिव्यक्ति मिलती है। कृष्ण के प्रति प्रेम भाव की व्यंजना ही मीराबाई की कविता का उद्देश्य रहा है तथा उस पर राजस्थानी, गुजराती, पश्चिमी हिंदी और पंजाबी का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है कृष्ण के प्रति उनकी आगाज प्रेम नहीं उन्हें कृष्णकाव्य के प्रति उनके अगाध प्रेम ने ही उन्हें कृष्ण काव्य के सम्मुख स्थल तक पहुंचाया। पदावली
पायोजी महै तो राम रतन धन पायो।
मीरा की मृत्यु द्वारिका में सन 1546 ईस्वी के आसपास मानी जाती है।