Geeta Saar (Hindi)

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Geeta Saar (Hindi) episodes

  • गीता सार – अध्याय 18
    मोक्षसंन्यासयोग
    इस अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को मोक्ष प्राप्ति के मार्ग के बारे में बताते हैं। वे कहते हैं कि मोक्ष प्राप्ति के लिए सब चीजों का मोह त्याग कर मनुष्य को पूरी तरह से ईश्वर को समर्पित हो जाना चाहिए।
    अपने जीवन के हर कर्म को कृष्ण को ही समर्पित कर देना चाहिए। उनसे अथाह प्रेम करना चाहिए। उन पर पूरी श्रद्धा रखनी चाहिए। उन्हें भजते रहना चाहिए। और सन्यासी की भांति किसी भी चीज से मोह नहीं करना चाहिए।
    इस प्रकार जीवन बिताने के बाद मनुष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
    अंत में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अगर वह अब भी युद्ध नहीं करना चाहता है तो वहाँ से जा सकता है। लेकिन विधि का विधान हमेशा होकर रहता है। कोई न कोई उसके बदले युद्ध कर ही लेगा।
    लेकिन अब तक अर्जुन का सारा संशय खत्म हो चुका था। वह भगवान श्री कृष्ण को प्रणाम करता है। और धर्म युद्ध के लिए तैयार हो जाता है।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 18 धन्यवाद
    14 min
  • गीता सार – अध्याय 13
    क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
    जो व्यक्ति शरीर, आत्मा, परमात्मा और ज्ञान के रहस्यों को समझ जाता है वह इस संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।
    आत्मा में ही परमात्मा का वास होता है। क्युँकि वह उसकी का भाग है। लेकिन अज्ञानवश मनुष्य उसे समझ नहीं पाता। इसलिए पहले ज्ञान हासिल करना चाहिए।
    ज्ञान का मकसद उस परमात्मा को समझना है। लेकिन इसके लिए मनुष्य को सदाचारी बनना चाहिए। अन्यथा उसमें अहंकार हो जायेगा। फिर वह इस रहस्य को समझा नहीं पायेगा। और परमात्मा को अपने भीतर खोज भी नहीं पायेगा।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 13 धन्यवाद
    8 min
  • गीता सार – अध्याय 07
    ज्ञानविज्ञानयोग
    श्री कृष्ण कहते हैं कि ब्रह्माण्ड की हर चीज उनकी ही बनायी हुई है। हर चीज में वे विद्धमान हैं।
    सूर्य, धरती, ग्रह , नक्षत्र, तारामंडल, ज्ञान , विज्ञान, इन्द्रियां, सुख -दुःख, पाप -पुण्य आदि सब उनके बनाये हुए हैं।
    जो मनुष्य इस बात को ज्ञान के द्वारा समझ जाते हैं वे ईश्वर को समर्पित हो जाते हैं। जबकि जो संदेह करते हैं
    वे संसार की भौतिक वस्तुओं को समर्पित हो जाते हैं। और यही उनके दुखों का कारण बना रहता है।
    उन्हें कभी बैकुंठ (मोक्ष) प्राप्त नहीं होता और बार -बार मृत्यु लोक में जन्म लेना पड़ता है। तथा सांसारिक दुःख भोगने पड़ते हैं।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 07 धन्यवाद
    8 min
  • गीता सार – अध्याय 12
    भक्तियोग
    श्री कृष्ण कहते हैं कि सबसे बड़ा योग भक्ति योग ही है। यदि कोई बड़े -बड़े वेद -पुराण नहीं पढ़ सकता, यज्ञ -हवन- तप आदि नहीं कर सकता तो उसे भक्ति योग का सहारा लेना चाहिए।
    मनुष्य को ईश्वर के प्रेम में लीन होकर उसकी भक्ति करनी चाहिए। उसके भजन गाने चाहिये। उसका मनन -चिंतन -और गुणगान करना चाहिये। स्वयं को पूरी तरह से श्री कृष्ण के चरणों में समप्रित कर देना चाहिए।
    ऐसे भक्त श्री कृष्ण को परम -प्रिय होते हैं। और वे खुद उनके भक्त हो जाते हैं। मीरा और सूरदास सच्चे भक्तों का उदाहरण हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु मोक्ष प्रदान करते हैं।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 12 धन्यवाद
    6 min
  • गीता सार – अध्याय 01
    युद्ध के मैदान में अर्जुन देखता है कि सामने कौरवों की सेना खड़ी है। उस सेना में उसके सगे – सम्बन्धी, मित्र, रिश्तेदार, गुरु आदि हैं। जिनसे उसे युद्ध करना था। मैं इनकी हत्या कैसे कर सकता हूँ – यह सोचकर अर्जुन शोक और ग्लानि से भर उठता है।
    वह अपना धनुष नीचे रख देता है। और अपने सारथी, भगवान श्री कृष्ण से पूछता है – मैं अपने लोगों से कैसे युद्ध कर सकता हूँ।
    यह कहकर वह असहाय मुद्रा में रथ की गद्दी पर बैठ जाता है।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय – 01 धन्यवाद
    13 min
  • गीता सार – अध्याय 16
    दैवासुरसम्पद्विभागयोग
    मनुष्यों में दो तरह की प्रवृति पायी जाती है : देव व् दानव।
    देव वृत्ति वालों में बहुत से अच्छे गुण होते हैं। जैसे सेवा भाव, संयम, सच्चाई, ईमानदारी, स्वच्छत्ता, शांति, आदि।
    ये मोक्ष के पात्र होते हैं।
    इसके विपरीत दानव वृत्ति वाले लोगों में बुरे गुण होते हैं जैसे – घमंड, ईर्ष्या, क्रोध , काम -वासना, हिंसा आदि।
    ये नरक के पात्र होते हैं।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 16 धन्यवाद
    6 min
  • गीता सार – अध्याय 05
    कर्मसंन्यासयोग
    श्री कृष्ण कहते हैं कि सन्यास का मतलब है सांसारिक वस्तुओं से विरक्त होकर ईश्वर की उपासना करना।
    लेकिन सन्यास लेने के लिए हर किसी को वन – गमन की जरुरत नहीं है।
    अपना कर्म करते हुए यदि भौतिक सुखों से मोह – भंग कर लिया जाये तो भी मनुष्य ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 05 धन्यवाद
    8 min
  • गीता सार – अध्याय 11
    विश्वरूपदर्शनयोग – Geeta Summary in Hindi
    इस अध्याय में श्री कृष्ण अर्जुन को अपने विराट रूप के दर्शन करवाते हैं। अर्जुन देखता है कि उनका स्वरुप तीनों लोकों में फैला हुआ है। समस्त ब्रह्माण्ड में उनकी ही छवि है।
    उनके चार हाथ हैं। और असंख्य सिर हैं। कुछ सिर बेहद डरावने हैं और कुछ बेहद सौम्य। कुछ मुखों से आग, जल आदि निकल रहे हैं। उनके एक तरफ से जीव -जंतु जन्म लेकर पृथ्वी की तरफ आ रहे हैं। और दूसरी तरफ वे मौत के गाल में समा रहे हैं।
    जन्म और मृत्यु सब श्री कृष्ण के द्वारा ही हैं। यह सब देखकर अर्जुन विस्मित हो जाता है। और श्रदा – पूर्वक प्रभु के चरणों में नमन करता है।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 11 धन्यवाद
    16 min
  • गीता सार – अध्याय 08
    अक्षरब्रह्मयोग – Geeta Summary in Hindi
    इस अध्याय में श्री कृष्ण, अर्जुन को ब्रह्म और आत्मा आदि के बारे में बताते हैं। कृष्ण कहते हैं कि अहम ब्रह्मास्मि।
    अर्थात मैं ही ब्रह्मा है।
    और चूँकि मनुष्य की आत्मा भी ईश्वर का ही भाग है इसलिए मनुष्य भी ब्रह्मा ही है। मनुष्य इन बातों को नहीं जान पाता क्युँकि उसकी बुद्धि पर मोहमाया का पर्दा पड़ा रहता है।
    साथ ही कृष्ण बताते हैं कि बाकी सारे देवी -देवता भी कृष्ण द्वारा ही बनाये गए हैं। उनकी पूजा करना भी परम-ब्रह्म यानि श्री कृष्ण की पूजा करना ही है।
    मृत्यु के समय जो कृष्ण का ध्यान करते हैं और कृष्ण को भजते हैं उन्हें वे मोक्ष दे देते हैं।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 08 धन्यवाद
    8 min
  • गीता सार – अध्याय 02
    सांख्ययोग
    श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि क्यों व्यर्थ चिंता करते हो। आत्मा तो अजर -अमर है। वह कभी नहीं मरती। सिर्फ यह शरीर मरता है।
    यह संसार और इसके लोग तुम्हारे बनाये हुए नहीं है। इनके मोह में क्यों बँध रहे हो ! इनके खो जाने का क्यों शोक कर रहे हो। ये सब तो पहले ही मर चुके हैं। और कई बार पैदा भी हो चुके हैं।
    तुम्हे सिर्फ धर्म की रक्षा के लिए यह युद्ध करना है। यही एक क्षत्रिय का कर्म है। यह सुनकर अर्जुन श्री कृष्ण से कहता है कि अभी भी उसके मन में बहुत से संशय हैं। और उसे सब कुछ विस्तार से बतायें।
    कृपया गीता के अध्ययन को बार बार सुने. प्रस्तुत है अध्याय - 02 धन्यवाद
    17 min

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