भारत में गीता सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ क्यों माना गया ? माना जाता है ? क्योंकि इसके केंद्र में धर्म है, धर्म युद्ध है और यह किताब हिंदुत्व को जँचती है। वरना, कोई पढ़ने पर आएगा तो ख़ुद जान जाएगा भारत में गीता से श्रेष्ठ ग्रन्थ धम्मपद है। इसके केंद्र में मनुष्यता है, करुणा और शांति है।
कहना ही होगा और कुछ अर्थों में दोहराना कि गीता वास्तव में धम्मपद की ही काट है। भारत में राक्षस कोई और नहीं स्वर्ग, ईश्वर और आत्मा को न मानने वाले यहीं के निवासी हैं फिर चाहे वे बौद्ध रहे हों या दूसरे नास्तिक।
क्या हम ग्रंथ निर्मित समाजिक सांस्कृतिक राजनीतिक अन्याय की काट ग्रंथों में ही देख पाते हैं ? क्या हमने कभी सोचा है कि मनुस्मृति एक मेनिफेस्टो है और इससे अनगिन ग्रंथ निकले ? आप महाभारत पढ़ें रामायण पढ़ें, पुराण या कुछ और इनकी नीति और न्याय मनुस्मृति की नीति और न्याय हैं।
एक उदाहरण से अपनी बात कहूँ तो मैं महाभारत और कृष्ण कथा के उपसंहार यानी काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'उपसंहार' का उदाहरण दूँगा। उपन्यास 'उपसंहार' में क्या है ? इसमें भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं दुनिया भर में प्रसिद्ध और जीवंत स्मृति बन चुके एक महा आख्यान का संक्षिप्त हिंदी औपन्यासिक रूप है।
यह उपन्यास अद्वितीय है। महाभारत को ऐसी विश्व युद्ध दृष्टि से आज तक किसी हिंदी लेखक ने नहीं देखा और न ही रचा। उपसंहार एक ऐसी उपन्यासकार दृष्टि है जिसमें दुनिया का कोई धार्मिक राष्ट्रवादी विनाश ही नहीं भारत में हिंदुत्व युद्ध का भी अंजाम दिखता है। मैं इसे हिंदी की एक बेहद प्रभावशाली और खरी दूरदर्शी कृति की तरह देखता हूँ।
'उपसंहार' भारतीय जनमानस की स्मृति से भी गहरे अध्यात्म में बसे एक महा नायक कृष्ण के बहाने दुनिया भर में हो चुके अथवा भारत में होने वाले नरसंहार का खुलासा है। काशीनाथ सिंह जी ने कहा भी था कि इसे लिखते हुए यानी कृष्ण के जीवन का उत्तरार्द्ध संक्षेप में लिखते हुए मेरे ध्यान में हिटलर था तो मोदी भी थे।
मैं सालों से इस कृति को पढ़ने, इस पर नाटक खेले जाने की अपील करता रहा हूँ। अंधा युग ने जहां कृष्ण को केवल एक श्राप दंड का फ़ैसला लिया था वहीं उपसंहार आज के किन्हीं कृष्ण जो अपने धर्म-राज के लिए गीता लेकर घूमते हैं को सज़ा देने लायक जन उभार का सपना देखता है।
©शशिभूषण