जिसने निराश होना नहीं जाना
एक आधुनिक व्यक्तिकी निराशा-आशा, हार-जीत और
विजयका यह वृत्तान्त देखिये, कितना प्रेरक है। यह आदमी तीस वर्षोंतक निराशासे युद्ध करता रहा और अन्तमें उसने निराशाको परास्त कर ही दिया।
बार-बार हारपर भी हिम्मत न हारी और अन्तमें विजय प्राप्त की।
सन् १८३१ में उस व्यक्तिको व्यापारमें बड़ी हानि हुई।
लेजिस्लेचरके चुनावमें उसकी हार हुई। १८३२ का वर्ष उसके लिये व्यर्थ गया!
सन् १८३३ में उसे व्यापारमें फिर भयंकर नुकसान हुआ।
१८३४ में फिर नये उत्साहसे, नयी तैयारीसे लेजिस्लेचरका चुनाव लड़ा।
सन् १८३५ में भाग्यने एक ठोकर और मारी।
इस वर्ष उसकी पत्नी की मृत्यु हो गयी!
सन् १८३६ में वह स्नायु-रोगसे पीड़ित हो गया।
सन् १८३८ में स्पीकरके चुनाव में हार !
सन् १८४३ में लैंड-अफसरकी नियुक्तिमें हार!
कांग्रेसके चुनावमें हार-१८४६ ।
दुबारा चुनावमें हार- १८४८ ।
सिनेटके चुनावमें हार- १८५५ ।
वाइस प्रेसीडेंटके चुनावमें हार- १८५६
सिनेटके चुनावमें हार- १८५८ ।
प्रेसीडेंटके चुनावमें जीत– १८६० और सर्वोच्च पदकी प्राप्ति।
तीस वर्षोंतक निराशाके झूलेमें झूलते रहनेपर भी आशाकी ज्योति, पूर्ण विजय, सार्वजनिक सम्मान, यश और विजय-वैजयन्तीको फहरानेवाला यह साहसी पुरुष थे श्री अब्राहम लिंकन अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति ।
यह गाँव का एक गरीब युवक था।
यह वह साहसी व्यक्ति था, जो इच्छाशक्तिके कारण मुसीबतों के तूफानसे घिर जानेपर, भी कभी निराश नहीं हुआ।
यह वह आदमी था, जिसने दुर्भाग्यके आगे कभी हार नहीं मानी, दृढ़ आत्मविश्वासका सम्बल लेकर नित्य-नवीन उत्साहसे जीवन पथपर आगे बढ़ता चला गया।