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एक बुजुर्ग वकील के एकांत, अधूरी मोहब्बत की कसक और डिजिटल दौर में मिटते जा रहे यादों के पदचिन्हों की यह एक बेहद भावुक दास्तां है।
इस एपिसोड में आप सुनेंगे:
बचपन की मासूमियत से लेकर यूनिवर्सिटी के दौर के लंबे खत।
८० के दशक के भारत का मध्यमवर्गीय संघर्ष और एक गलतफहमी से बिखरता रिश्ता।
उम्र के ढलते पड़ाव पर पुरानी दिल्ली और कनॉट प्लेस की गलियों में बीता 'गोधूलि बेला का संगीत'।
रिश्तों की 'एक्सपायरी डेट' और गरिमा के साथ किसी को अलविदा कहने का दार्शनिक सच।
ये कहानी है जो वास्तविकता से बहुत परे नहीं है! कुछ भूली बिसरी यादें हैं जो कभी आपसे ही उलझ कर आपसे सवाल करने लग जाती हैं। कोई चेहरा जाना पहचाना सा लगता है। कभी आपको लगता है कि कोई रास्ता जहां आप पहली बार जा रहे होते हैं… देखा दाखा सा है…
It is a prologue to my book, My Dear Reha which is available on Amazon
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