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The Alchemist Hindi audiobook by Deepak Thakur The Alchemist Book ब्राजील के लेखक पाउलो कोएल्हो का एक उपन्यास है जो पहली बार 1988 में प्रकाशित हुआ था। मूल रूप से पुर्तगाली में लिखा गया, यह व्यापक रूप से अनुवादित अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर बन गया। और इस पुस्तक का हिंदी अनुवादन किया है मदन सोनी जी ने !
The Alchemist Hindi audiobook by Deepak Thakur The Alchemist Book ब्राजील के लेखक पाउलो कोएल्हो का एक उपन्यास है जो पहली बार 1988 में प्रकाशित हुआ था। मूल रूप से पुर्तगाली में लिखा गया, यह व्यापक रूप से अनुवादित अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर बन गया। और इस पुस्तक का हिंदी अनुवादन किया है मदन सोनी जी ने ! अपनी ज़बरदस्त सरलता और आत्मा को झकझोर देने वाली बुद्धिमत्ता से युक्त यह सेंटियागो नामक एक एंडालूसियाई गड़रिया लड़के की कहानी है जो मिस्र के पिरामिडों में दफ़्न एक ख़ज़ाने की खोज में अपनी मातृभूमि स्पेन से मिस्र के रेगिस्तान तक का सफ़र करता है। रास्ते में उसकी मुलाक़ात एक जिप्सी औरत से, खुद को राजा कहने वाले एक व्यक्ति से, और एक कीमियागर से होती है। ये सभी सेंटियागो को उसकी खोज की दिशा में जाने का संकेत करते हैं। कोई नहीं जानता कि वह ख़ज़ाना क्या है, और सेंटियागो रास्ते में आने वाली रुकावटों को पार कर पाएगा या नहीं। लेकिन सांसारिक वस्तुओं की खोज के तौर पर शुरू हुई यह यात्रा अन्त में अपने ही भीतर छिपे ख़ज़ाने की खोज की यात्रा साबित होती है। सेंटियागो की यह अत्यन्त चित्ताकर्षक, उत्प्रेरक, और मानवीय मर्म से युक्त कहानी हमारे स्वप्नों की रूपान्तरकारी शक्ति और अपने हृदय की आवाज़ सुनने के महत्त्व का शाश्वत प्रमाण है। ‘‘पाओलो कोएलो की पुस्तकों से प्रभावित होकर लाखों लोग अपने जीवन को निखारने के लिए प्रेरित हुए हैं।’’ यहाँ से आप पुस्तक खरीद सकते है : https://www.amazon.in/Alchemist-Hindi... यहाँ से आप पुस्तक खरीद सकते है : https://www.flipkart.com/alcemist-pap... #thealchemist #thealchemisthindiaudiobook #hindiaudiobook #PauloCoelho
The Alchemist Hindi audiobook by Deepak Thakur
The Alchemist Book ब्राजील के लेखक पाउलो कोएल्हो का एक उपन्यास है जो पहली बार 1988 में प्रकाशित हुआ था। मूल रूप से पुर्तगाली में लिखा गया, यह व्यापक रूप से अनुवादित अंतरराष्ट्रीय बेस्टसेलर बन गया। और इस पुस्तक का हिंदी अनुवादन किया है मदन सोनी जी ने !
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https://youtu.be/lpdF15-AynE
अपनी ज़बरदस्त सरलता और आत्मा को झकझोर देने वाली बुद्धिमत्ता से युक्त यह सेंटियागो नामक एक एंडालूसियाई गड़रिया लड़के की कहानी है जो मिस्र के पिरामिडों में दफ़्न एक ख़ज़ाने की खोज में अपनी मातृभूमि स्पेन से मिस्र के रेगिस्तान तक का सफ़र करता है। रास्ते में उसकी मुलाक़ात एक जिप्सी औरत से, खुद को राजा कहने वाले एक व्यक्ति से, और एक कीमियागर से होती है। ये सभी सेंटियागो को उसकी खोज की दिशा में जाने का संकेत करते हैं। कोई नहीं जानता कि वह ख़ज़ाना क्या है, और सेंटियागो रास्ते में आने वाली रुकावटों को पार कर पाएगा या नहीं। लेकिन सांसारिक वस्तुओं की खोज के तौर पर शुरू हुई यह यात्रा अन्त में अपने ही भीतर छिपे ख़ज़ाने की खोज की यात्रा साबित होती है। सेंटियागो की यह अत्यन्त चित्ताकर्षक, उत्प्रेरक, और मानवीय मर्म से युक्त कहानी हमारे स्वप्नों की रूपान्तरकारी शक्ति और अपने हृदय की आवाज़ सुनने के महत्त्व का शाश्वत प्रमाण है।
‘‘पाओलो कोएलो की पुस्तकों से प्रभावित होकर लाखों लोग अपने जीवन को निखारने के लिए प्रेरित हुए हैं।’’
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दूसरे अध्याय का नाम सांख्ययोग है। इसमें जीवन की दो प्राचीन संमानित परंपराओं का तर्कों द्वारा वर्णन आया है। अर्जुन को उस कृपण स्थिति में रोते देखकर कृष्ण ने उसका ध्यान दिलाया है कि इस प्रकार का क्लैव्य और हृदय की क्षुद्र दुर्बलता अर्जुन जैसे वीर के लिए उचित नहीं।
प्रथम अध्याय का नाम अर्जुनविषादयोग है। वह गीता के उपदेश का विलक्षण नाटकीय रंगमंच प्रस्तुत करता है जिसमें श्रोता और वक्ता दोनों ही कुतूहल शांति के लिए नहीं वरन् जीवन की प्रगाढ़ समस्या के समाधान के लिये प्रवृत्त होते हैं। शौर्य और धैर्य, साहस और बल इन चारों गुणों की प्रभूत मात्रा से अर्जुन का व्यक्तित्व बना था और इन चारों के ऊपर दो गुण और थे एक क्षमा, दूसरी प्रज्ञा। बलप्रधान क्षात्रधर्म से प्राप्त होनेवाली स्थिति में पहुँचकर सहसा अर्जुन के चित्त पर एक दूसरे ही प्रकार के मनोभाव का आक्रमण हुआ, कार्पण्य का। एक विचित्र प्रकार की करुणा उसके मन में भर गई और उसका क्षात्र स्वभाव लुप्त हो गया। जिस कर्तव्य के लिए वह कटिबद्ध हुआ था उससे वह विमुख हो गया। ऊपर से देखने पर तो इस स्थिति के पक्ष में उसके तर्क धर्मयुक्त जान पड़ते हैं, किंतु उसने स्वयं ही उसे कार्पण्य दोष कहा है और यह माना है कि मन की इस कायरता के कारण उसका जन्मसिद्ध स्वभाव उपहत या नष्ट हो गया था। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि युद्ध करे अथवा वैराग्य ले ले। क्या करें, क्या न करें, कुछ समझ में नहीं आता था। इस मनोभाव की चरम स्थिति में पहुँचकर उसने धनुषबाण एक ओर डाल दिया।
कुरुक्षेत्र युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य कुरु साम्राज्य के सिंहासन की प्राप्ति के लिए लड़ा गया था। महाभारत के अनुसार इस युद्ध में भारत के प्रायः सभी जनपदों ने भाग लिया था। महाभारत व अन्य वैदिक साहित्यों के अनुसार यह प्राचीन भारत में वैदिक काल के इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था। [1] इस युद्ध में लाखों क्षत्रिय योद्धा मारे गये जिसके परिणामस्वरूप वैदिक संस्कृति तथा सभ्यता का पतन हो गया था। इस युद्ध में सम्पूर्ण भारतवर्ष के राजाओं के अतिरिक्त बहुत से अन्य देशों के क्षत्रिय वीरों ने भी भाग लिया और सब के सब वीर गति को प्राप्त हो गये। [2] इस युद्ध के परिणामस्वरुप भारत में ज्ञान और विज्ञान दोनों के साथ-साथ वीर क्षत्रियों का अभाव हो गया। एक तरह से वैदिक संस्कृति और सभ्यता जो विकास के चरम पर थी उसका एकाएक विनाश हो गया। प्राचीन भारत की स्वर्णिम वैदिक सभ्यता इस युद्ध की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो गयी। इस महान युद्ध का उस समय के महान ऋषि और दार्शनिक भगवान वेदव्यास ने अपने महाकाव्य महाभारत में वर्णन किया, जिसे सहस्राब्दियों तक सम्पूर्ण भारतवर्ष में गाकर एवं सुनकर याद रखा गया। [3]
उद्योग पर्व में विराट की सभा में पाण्डव पक्ष से श्रीकृष्ण, बलराम, सात्यकि का एकत्र होना और युद्ध के लिए द्रुपद की सहायता से पाण्डवों का युद्धसज्जित होना, कौरवों की युद्ध की तैयारी, द्रुपद के पुरोहित ला कौरवों की सभा जाना और सन्देश-कथन, धृतराष्ट्र का पाण्डवों के यहाँ संजय को संदेश देकर भेजना, संजय का युधिष्ठिर से वार्तालाप, धृतराष्ट्र का विदुर से वार्तालाप, सनत्सुजात द्वारा धृतराष्ट्र को उपदेश, धृतराष्ट्र की सभा में लौटे हुए संजय तथा पाण्डवों का सन्देश-कथन, युधिष्ठिर के सेनाबल का वर्णन, संजय द्वारा धृतराष्ट्र को और धृतराष्ट्र द्वारा दुर्योधन को समझाना, पाण्डवों से परामर्श कर कृष्ण द्वारा शान्ति प्रस्ताव लेकर कौरवों के पास जाना, दुर्योधन द्वारा श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने का षडयन्त्र करना, गरुड़गालवसंवाद, विदुलोपाख्यान, लौटे हुए श्रीकृष्ण द्वारा कौरवों को दण्ड देने का परामर्श, पाण्डवों और कौरवों द्वारा सैन्यशिविर की स्थापना और सेनापतियों का चयन, दुर्योधन के दूत उलूक द्वारा सन्देश लेकर पाण्डव-सभा में जाना, दोनों पक्षों की सेनाओं का वर्णन, अम्बोपाख्यान, भीष्म-परशुराम का युद्ध आदि विषयों का वर्णन है।
संजय महर्षि व्यास के शिष्य तथा धृतराष्ट्र की राजसभा के सम्मानित सदस्य थे। ये विद्वान गावाल्गण नामक सूत के पुत्र और जाति से बुनकर थे। वे विनम्र और धार्मिक स्वभाव के थे और अपनी स्पष्टवादिता के लिए प्रसिद्ध थे। संजय धृतराष्ट्र के मन्त्री तथा श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वे धर्म के पक्षपाती थे, इसी कारण से धृतराष्ट्र के मन्त्री होने पर भी पांडवों के प्रति सहानुभुति रखते थे। धृतराष्ट्र और उनके पुत्रों को अधर्म से रोकने के लिये कड़े-से-कड़े बचन कहने में भी संजय हिचकते नहीं थे। वे राजा को समय-समय पर सलाह देते और दुर्योधन द्वारा पांडवों के साथ किये जाने वाले असहिष्णु व्यवहार के प्रति चेताते रहते। जब दूसरी बार द्यूतक्रीड़ा में पांडव हारकर वन को चले गए, तब संजय ने धृतराष्ट्र को चेतावनी दी- "हे राजन! कुरु वंश का समूल नाश तो अवश्यंभावी है ही अपितु निरीह प्रजा व्यर्थ में मारी जाएगी। विदुर, भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य आदि के द्वारा रोके जाने पर भी आपके पुत्रों ने द्रौपदी का अपमान किया। इस तरह उन्होंने पांडवों के कोप को स्वत: निमन्त्रण दे दिया है।"
चलों मान भी लें कि उपरोक्त बताए गया सब कुछ हो गया था तब भी महाभारत के यद्धु को होने से रोका जा सकता था यदि द्यूत क्रीड़ा का आयोजन नहीं होता। राजभवन में कौरवों और पांडवों के बीच द्यूत क्रीड़ा यानि चौसर खेलने को अनुमित देना भीष्म की सबसे बड़ी भूल थी। वो चाहते तो ये क्रीड़ा रोक सकते थे लेकिन चौसर के इस खेल ने सब कुछ चौपट कर दिया। यह महाभारत युद्ध का टर्निंग पाइंट था। भीष्म के इजाजत देने के बाद युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगाकर दूसरी सबसे बड़ी भूल की थी जिसके कारण महाभारत का युद्ध होना और भी पुख्ता हो गया। युधिष्ठि ने अपने भाइयों और पत्नी तक को जुए में दांव पर लगाकर अनजाने ही युद्ध और विनाश के बीज बोए थे।
दुर्योधन और शकुनि राजा धृतराष्ट्र के पास गये और उनसे चौसर के खेल का आयोजन रखने का आग्रह किया। धृतराष्ट्र ने कहा कि वो विदुर की सलाह के पश्चात इसका निर्णय करेंगे लेकिन दुर्योधन को बिना पूछे इस खेल का आयोजन करने के लिए अपने पिता को बाध्य किया। अंत में धृतराष्ट्र को उनकी बात माननी पड़ी और उसें चौसर के खेल के आयोजन की घोषणा करवाई। विदुर को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने धृतराष्ट्र को बताया कि इस खेल से हमारे कुल का नाश हो जाएगा लेकिन पुत्र प्रेम में धृतराष्ट्र कुछ नही बोले। भीष्म पितामह भी चुप रहे। धृतराष्ट्र ने विदुर को युधिष्ठिर को खेल का न्योता देने को भेजा।
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चलों मान भी लें कि उपरोक्त बताए गया सब कुछ हो गया था तब भी महाभारत के यद्धु को होने से रोका जा सकता था यदि द्यूत क्रीड़ा का आयोजन नहीं होता। राजभवन में कौरवों और पांडवों के बीच द्यूत क्रीड़ा यानि चौसर खेलने को अनुमित देना भीष्म की सबसे बड़ी भूल थी। वो चाहते तो ये क्रीड़ा रोक सकते थे लेकिन चौसर के इस खेल ने सब कुछ चौपट कर दिया। यह महाभारत युद्ध का टर्निंग पाइंट था। भीष्म के इजाजत देने के बाद युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगाकर दूसरी सबसे बड़ी भूल की थी जिसके कारण महाभारत का युद्ध होना और भी पुख्ता हो गया। युधिष्ठि ने अपने भाइयों और पत्नी तक को जुए में दांव पर लगाकर अनजाने ही युद्ध और विनाश के बीज बोए थे।
दुर्योधन और शकुनि राजा धृतराष्ट्र के पास गये और उनसे चौसर के खेल का आयोजन रखने का आग्रह किया। धृतराष्ट्र ने कहा कि वो विदुर की सलाह के पश्चात इसका निर्णय करेंगे लेकिन दुर्योधन को बिना पूछे इस खेल का आयोजन करने के लिए अपने पिता को बाध्य किया। अंत में धृतराष्ट्र को उनकी बात माननी पड़ी और उसें चौसर के खेल के आयोजन की घोषणा करवाई। विदुर को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने धृतराष्ट्र को बताया कि इस खेल से हमारे कुल का नाश हो जाएगा लेकिन पुत्र प्रेम में धृतराष्ट्र कुछ नही बोले। भीष्म पितामह भी चुप रहे। धृतराष्ट्र ने विदुर को युधिष्ठिर को खेल का न्योता देने को भेजा।
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