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लोकसभा चुनावों के बाद नीतीश का हाल क्या होगा..., बता रहे हैं प्रख्यात राजनीतिक टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी। पारस नाथ चौधरी हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया संस्थान से जुड़े रहे हैं व बिहार के मामलों पर अच्छी समझ रखते हैं। उनसे बात कर रहे हैं मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र कुमार।
प्रशांत किशोर एक बेहतरीन विश्लेषक हैं, लेकिन क्या वह कोई राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने की कुव्वत रखते हैं…, बता रहे हैं प्रख्यात राजनीतिक टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी। पारस नाथ चौधरी हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया संस्थान से जुड़े रहे हैं व बिहार के मामलों पर अच्छी समझ रखते हैं। उनसे बात कर रहे हैं मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र कुमार।
इस बार के लोकसभा चुनावों के दौरान बिहार में मुस्लिम-यादव गठजोड़ कितना कामयाब हो सकता है, बता रहे हैं प्रख्यात राजनीतिक टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी। पारस नाथ चौधरी हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया संस्थान से सेवानिवृत्त हैं व बिहार के मामलों पर अच्छी समझ रखते हैं। उनसे बात कर रहे हैं मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र कुमार।
राजनीतिक रूप से बिहार में बीते पांच साल काफी उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। इस दौरान बिहार की जनता ने नीतीश कुमार की बीजेपी व राजद जैसे विपरीत स्वभाव वाले दलों के साथ सरकारें देखीं। लेकिन, अब बिहार में एक नए तरह का 'आशावाद' दिखाई दे रहा है। बिहार के मौजूदा माहौल के बारे में विस्तार से बता रहे हैं, प्रख्यात राजनीतिक टिप्पणीकार पारस नाथ चौधरी। पारस नाथ चौधरी हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया संस्थान से जुड़े रहे हैं व बिहार के मामलों पर अच्छी समझ रखते हैं। उनसे बात कर रहे हैं मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र कुमार।
कच्चतीवू मामले से एक तरफ जहां राष्ट्रवादी राजनीति को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी, वहीं स्थानीय तमिल राजनीति को एक जोरदार झटका भी लग सकता है। इस मामले का तमिल राजनीति पर पड़ने वाले असर के बारे में बता रहे हैं, वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल। ब्रज खंडेलवाल देश के वह पहले पत्रकार हैं, जिन्होंने कच्चतीवू को श्रीलंका के हवाले किए जाने के विरोधस्वरूप सबसे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका डाली थी, जिसे साल 1971 के युद्ध की वजह से लगाए गए आपातकाल की वजह से यह कहकर खारिज कर दिया गया कि उस समय सभी प्रकार के मूल नागरिक अधिकारों पर पाबंदी है। उनसे बात कर रहे हैं मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र
इंदिरा गांधी द्वारा कच्चतीवू द्वीप को श्रीलंका के हवाले कर दिए जाने व बांग्लादेश के साथ हुए सीमावर्ती गांवों के लेन-देन समझौते में क्या अंतर है, तथा मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास इस मामले में उपलब्ध विकल्प और इस मसले को उठाने के पीछे उनकी मंशा के बारे में बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल। ब्रज खंडेलवाल देश के वह पहले पत्रकार हैं, जिन्होंने कच्चतीवू को श्रीलंका के हवाले किए जाने के विरोधस्वरूप सबसे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका डाली, जिसे साल 1971 के युद्ध की वजह से लगाए गए आपातकाल की वजह से यह कहकर खारिज कर दिया गया कि उस समय सभी प्रकार के मूल नागरिक अधिकारों पर पाबंदी है। उनसे बात कर रहे हैं मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र कुमार।
Questions are being raised on the timing of PM Narendra Modi raising the Kachchatheevu issue with such aggression. Senior journalist Brij Khandelwal explains this in detail. He is the first journalist in the country to file a petition in the Delhi High Court against the handing over of Kachchatheevu to Sri Lanka, which was rejected due to the emergency imposed during the 1971 Indo-Pakistan war. All types of basic civil rights were restricted at that time. Dharmendra Kumar, Editor, Mediabharti.net is talking to him…
इंदिरा गांधी द्वारा कच्चतीवू द्वीप श्रीलंका को दे दिए जाने की पूरी कहानी बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल। ब्रज खंडेलवाल देश के वह पहले पत्रकार हैं, जिन्होंने कच्चतीवू को श्रीलंका के हवाले किए जाने के विरोध में सबसे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसे साल 1971 के युद्ध की वजह से लगाए गए आपातकाल के दौरान यह कहकर खारिज कर दिया गया कि उस समय नागरिकों के सभी प्रकार के मूल अधिकारों पर पाबंदी है। उनसे बात कर रहे हैं मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र कुमार।
सरकारी नौकरियों के मामले में हरियाणा में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। ऐसी नौकरियों में रिश्वत लेकर भर्तियां किए जाने के चलन को यहां एक जोरदार धक्का लगा है। इस मसले पर आपस में बात कर रहे हैं दिल्ली से जीइंडियान्यूज.कॉम के संपादक ललित सिंह गोदारा और मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र कुमार।
नरेंद्र मोदी की सरकार को पूरा एक दशक बीत चुका है। ऐसे में क्या यह संभव है कि उन्होंने कोई गलती की ही न हो! निश्चित रूप से उनके कार्यकाल में कई गलतियां हुईं हैं, तो विपक्ष उन गलतियों को भांपने में नाकाम क्यों रहा है? इस मसले पर आपस में बात कर रहे हैं दिल्ली से जीइंडियान्यूज.कॉम के संपादक ललित सिंह गोदारा और मीडियाभारती.नेट के संपादक धर्मेंद्र कुमार।
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