साईं, जब तुम मोहि बिसरावत।
भूलि जात भौजाल-जगत मां, मोहिं नाहिं कछु भावत।।
जानि परत पहिचान होत जब, चरन-सरन लै आवत।
जब पहिचान होत है तुमसे, सूरति सुरति मिलावत।।
जो कोई चहै कि करौं बंदगी, बपुरा कौन कहावत।
चाहत खैंचि सरन ही राखत, चाहत दूरि बहावत।।
हौं अजान अज्ञान अहौं प्रभु, तुमतें कहिकै सुनावत।
जगजीवन पर करत हौ दाया, तेहिते नहिं बिसरावत।।
जोग जुक्ति कुछ आवै नाहीं, अंत भर्म महं परहीं।।
गे भरुहाइ अस्तुति जेइ कीन्हा, मनहि समुझि ना परई।
रहनी गहनी आवै नाहीं, सब्द कहे तें लरई।।
नहीं विवेक कहै कछु औरे, और ज्ञान कथि करई।
सूझि बूझि कछु आवै नाहीं, भजन न एको सरई।।
कहा हमार जो मानै कोई, सिद्ध सत्त चित धरई।
जगजीवन जो कहा न मानै, भार जाए सो परई।।
बहु पद जोरि-जोरि करि गावहिं।
साधन कहा सो काटि-कपटिकै, अपन कहा गोहरावहिं।।
निंदा करहिं विवाद जहां-तहं, वक्ता बड़े कहावहिं।
आपु अंध कछु चेतत नाहीं, औरन अर्थ बतावहिं।।
जो कोउ राम का भजन करत है, तेहिकां कहि भरमावाह।
माला मुद्रा भेष किए बहु, जग परमोधि पुजावहिं।।
जहंते आए सो सुधि नाहीं, झगरे जन्म गवावहिं।
जगजीवन ते निंदक वादी, बास नर्क महं पावहिं।।
जो न काबे में है महदूद न बुतखाने में
हाय वो और इक उजड़े हुए काशाने में
मिलती है उम्रे-अबद इश्क के मैखाने में
ऐ अजल तू भी समा जा मेरे पैमाने में
हरमो-दैर में रिंदों का ठिकाना ही न था
वो तो ये कहिए अमां मिल गई मैखाने में
आज तो कर दिया साकी ने मुझे मस्त-अलस्त
डाल कर खास निगाहें मेरे पैमाने में
आप देखें तो सही रब्ते-मोहब्बत क्या है
अपना अफसाना मिला कर मिरे अफसाने में
हज्बे-मय ने तिरा ऐ शैख भरम खोल दिया
तू तो मस्जिद में है नीयत तेरी मैखाने में
मश्वुरे होते हैं जो शैखो-बिरहमन में "जिगर"
रिंद सुन लेते हैं, बैठे हुए मैखाने में