अरी, मैं तो नाम के रंग छकी।।
जब तें चाख्या बिमल प्रेमरस, तब तें कछु न सोहाई।
रैनि दिना धुनि लागि रहीं, कोउ केतौ कहै समुझाई।।
नाम पियाला घोंटिकै, कछु और न मोहिं चही।
जब डोरी लागी नाम की तब केहिकै कानि रही।।
जो यहि रंग में मस्त रहत है, तेहि कैं सुधि हरना।
गगन-मंदिल दृढ़ डोरि लगावहु, जाहि रहौ सरना।
निर्भय ह्वैकै बैठि रहौं अब, मांगौं यह बर सोई।।
जगजीवन विनती यह मोरी, फिरि आवन नहिं होई।।
मैं तोहिं चीन्हा, अब तौ सीस चरन तर दीन्हा।।
तब तें तन मन कछु न सोहाय।।
कहा कहौं कछु कहि नहिं जाय।
अब मोहि कां सुधि समुझि न आय।।
भंवर-गुफा तुम रहेउ छिपाय।।
रहिउं मैं निरमल दृष्टि निहारी।
ए सखि मोहिं ते कहिय न आवै, कस-कस करहुं पुकारी।।
रूप अनूप कहां लगि बरनौं, डारौं सब कुछु वारी।
रवि ससि गन तेहिं छबि सम नाहीं, जिन केहु कहा बिचारी।।
जगजीवन गहि सतगुरु चरना, दीजै सबै बिसारी।।
ये मैकशी है तो फिर शाने-मैकशी क्या है
बहक न जाए जो पीकर, वो रिंद ही क्या है
बस एक सम्त उड़ा जा रहा हूं वहशत में
खबर नहीं कि खुदी क्या है, बेखुदी क्या है
मैं जह्रेमर्ग गवारा करूं कि तल्खी-ए-जीस्त
मेरी खुशी तो है सब कुछ, तेरी खुशी क्या है
ये दर्स मैंने लिया मक्तबे-मोहब्बत से
किसी तरह जो कट जाय जिंदगी क्या है