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भारत के दक्षिण में स्थित महिलारोप्य नामक नगर के बाहर भगवान् शंकर का एक मठ था, जहाँ ताम्रचूड़ नामक सन्यासी नगर से भिक्षा माँगकर अपना जीवनयापन किया करता था। वह आधी भिक्षा से अपना पेट भरता था और आधी को एक पोटली में बाँधकर खूँटी पर लटका दिया करता था। उस आधी भिक्षा को वह उस मठ की सफ़ाई करने वाले कर्मचारियों को उनके वेतन के रूप में बाँट देता था। इस प्रकार उस मठ का रखरखाव भली प्रकार हो जाता था।
एक दिन हिरण्यक नामक चूहे से मठ के आसपास रहने वाले चूहों ने कहा , “हम अपनी भूख मिटाने के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं जबकि खूँटी पर टँगी पोटली में स्वादिष्ट भोजन बँधा रहता है। हम कोशिश करके भी उस खूँटी तक नहीं पहुँच पाते हैं। आप हमारी कुछ सहायता क्यों नहीं करते?”
अपने साथियों की बात सुनकर हिरण्यक उनके साथ मठ में पहुँच गया। उसने एक ऊँची छलाँग लगाई। पोटली में रखे भोजन को स्वयं भी खाया और अपने साथियों को भी खिलाया। अब यह सिलसिला हर रोज़ चलने लगा। इससे सफ़ाई कर्मचारियों ने वेतन ना पाकर मठ में काम करना बन्द कर दिया और सन्यासी परेशान हो उठा। सन्यासी ने हिरण्यक को रोकने का पूरा प्रयास किया, किन्तु उसके सोते ही हिरण्यक अपने काम में लग जाता था। अचानक ताम्रचूड़ एक फटा हुआ बाँस ले आया और हिरण्यक को भिक्षापात्र से दूर रखने के लिए सोते समय उस बाँस को धरती पर पटकने लगा। बाँस के प्रहार के डर से हिरण्यक अन्न खाए बिना ही भाग उठता था। इस प्रकार उस सन्यासी और हिरण्यक की पूरी-पूरी रात एक-दूसरे को छकाने में ही बीतने लगी।
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अर्थात् जिसके भाग्य में जितना लिखा होता है उसे उतना ही मिलता है, देखो कैसे अकेले बैल के मारे जाने की आशा में सियार को पन्द्रह वर्षों तक भटकना पड़ा।
किसी जंगल में तीक्ष्णशृंग नामक एक बैल रहता था वह अपनी शक्ति के नशे में चूर होकर अपने झुण्ड से अलग हो गया था और अकेला ही घूमता रहता था। हरी-हरी घास खाता, ठण्डा जल पीता और अपने तीख़े सींगों से खेलता रहता था। उसी जंगल में अपनी पत्नी के साथ एक लोभी सियार भी रहता था। नदी के तट पर जल पीने आए उस बैल को देखकर उसकी पत्नी कहने लगी, “यह अकेला बैल कब तक जीवित रह पाएगा? जाओ, तुम इस बैल का पीछा करो। अब जाकर हमें कोई अच्छा गोश्त खाने को मिलेगा।”
सियार बोला, “अरे मुझे यहीं बैठा रहने दो। जल पीने के लिए आने वाले चूहों को खाकर ही हम दोनों अपनी भूख मिटा लेंगे। जो हमें मिल नहीं सकता उसके पीछे भागना मूर्खता होती है।”
सियारिन बोली, “तुम मुझे भाग्य से मिले थोड़े-बहुत पर ही सन्तुष्ट होने वाले आलसी लगते हो। अगर तुम अपना आलस छोड़ कर और पूरे ध्यान से इस बैल का पीछा करोगे तो हमें अवश्य ही सफलता हासिल होगी। तुम भले ही मत जाओ, मैं तो जा रही हूँ।”
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एक नगर में रहने वाला सोमिलक नामक जुलाहा एक उच्चकोटि का कलाकार था। वह राजाओं के लिए अच्छे वस्त्र बुनता था, लेकिन फिर भी वह साधारण जुलाहों जितना भी धन नहीं कमा पाता था। अपनी आर्थिक स्थिति से परेशान होकर एक दिन सोमिलक अपनी पत्नी से बोला, “प्रिये! भगवान की यह कैसी लीला है कि साधारण जुलाहे भी मुझसे अधिक कमा लेते हैं। मैं सोचता हूँ कि शायद यह स्थान मेरे लिए सही नहीं है इसलिए मैं किसी अन्य स्थान पर जाकर अपना भाग्य आजमाना चाहता हूँ।”
अर्थस्योपार्जनं कृत्वा नैव भोगं समश्नुते।
अरण्यं महदासाद्य मूढः सोमिलको यथा॥
अर्थात् धन का उपार्जन करने पर भी कई लोग उसका भोग नहीं कर पाते हैं, देखें किस प्रकार मूर्ख सोमलिक धनोपार्जन करके भी ग़रीब ही रहा।
सोमिलक की पत्नी बोली, “आपका ऐसा सोचना उचित नहीं है। भले ही मेरुपर्वत पर चले जाओ, चाहे मरुस्थल में रहने लगो. आप चाहे कहीं भी चले जाओ अगर आप अपने जोड़े हुए धन का इस्तेमाल नहीं करोगे, तो कमाया हुआ धन भी चला जाएगा। इसलिए मैं कहती हूँ कि आप अपना काम-धन्धा यहीं रहकर करते रहो।”
जुलाहा बोला, “प्रिये! मैं तुम्हारे इस विचार से सहमत नहीं हूँ। परिश्रम करने से कोई भी व्यक्ति अपने भाग्य को बदल सकता है। इसलिए मैं दूसरे देश अवश्य जाऊँगा।”
यह सोचकर सोमिलक दूसरे नगर में जाकर कुशलतापूर्वक श्रम करने लगा और कुछ ही समय में उसने तीन सौ स्वर्णमुद्राएँ कमा ली। फिर वह उन स्वर्णमुद्राओं को लेकर अपने घर की ओर चल दिया। रास्ते में सूर्यास्त हो गया, तो जंगली पशुओं से बचने के लिए वह एक पेड़ की शाखा पर चढ़कर सो गया। आधी रात में उसने भाग्य और पुरुषार्थ नामक दो व्यक्तियों को कहते सुना।
भाग्य ने पुरुषार्थ से कहा, “जब तुम्हें पता है कि इस जुलाहे के भाग्य में अधिक धन नहीं लिखा, तब तुमने इसे तीन सौ स्वर्णमुद्राएँ क्यों दीं?”
पुरुषार्थ ने उत्तर दिया, “मुझे तो उसके परिश्रम का फल उसे देना ही था, अब आगे की तुम जानो।”
यह सुनते ही जुलाहे की नींद खुल गई और उसने अपनी थैली सम्भाली, तो वह ख़ाली थी। यह देखकर वह रोने लगा। ख़ाली हाथ घर जाना उचित ना समझकर, वह पुनः अपने काम पर वापस लौट आया और फिर से परिश्रम करने लगा।
एक वर्ष में पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ जुटाकर वह पुनः एक दिन अपने घर को चल दिया। इस बार सूर्यास्त हो जाने पर भी उसने रुकना अथवा सोना उचित नहीं समझा और चलता ही रहा।
लेकिन इस बार उसने अँधेरे रास्ते में दो व्यक्तियों को एक-दूसरे से यह कहते हुए सुना, “तुमने फिर उसे इतना धन दे दिया, जबकि तुम जानते हो कि उसके भाग्य में खाने-पीने भर से अधिक नहीं है।”
दूसरे ने उत्तर दिया, “मुझे तो उसे उसके परिश्रम का फल देना ही था। अब आगे की तुम जानो।”
इस बातचीत को सुनते ही जुलाहे ने अपनी थैली देखी तो उसको ख़ाली पाया। वह अपना सिर पीटकर रोने लगा।
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एक बार एक शिकारी घने जंगल में शिकार करने गया। तभी उसकी नज़र एक काले रंग के मोटे जंगली सूअर पर पड़ी। शिकारी ने अपने बाण से उस सूअर पर हमला कर दिया। घायल सूअर ने भी पलटकर अपने सींग उस शिकारी की छाती में घुसेड़ दिए। इस प्रकार बाण लगने से जंगली सूअर की मौत हो गई और सूअर के सींग से शिकारी भी मर गया।
इसी बीच भूख से हैरान-परेशान एक गीदड़ वहाँ आ पहुँचा और दोनों को मरा देखकर अपने भाग्य को सराहता हुआ कहने लगा, “लगता है कि आज भगवान् मुझ पर प्रसन्न है। तभी तो बिना चाहे और बिना भटके इतना सारा भोजन मिल गया।” गीदड़ ने सोचा कि मुझे इस भोजन का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिए, जिससे मेरी गाड़ी बहुत दिनों तक चल सके और मुझे अधिक दिनों तक भोजन की तलाश में भटकना ना पड़े। इसलिए आज केवल शिकारीके धनुष में लगी डोरी को खाकर ही अपना गुजारा कर लेना चाहिए।
यह सोचकर गीदड़ धनुष की डोर को अपने मुख में डालकर चबाने लगा। लेकिन डोरी के टूटते ही धनुष का ऊपरी हिस्सा इतनी तेजी से गीदड़ की छाती में आ लगा कि वह चीख़ मारकर गिर पड़ा और उसके प्राण निकल गये।
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नाकस्माच्छाण्डिली मातर्विक्रीणाति तिलैस्तिलान्।
लुञ्चितानितरैर्येन हेतुरत्र भविष्यति॥
अर्थात् यदि शाण्डली अपने धुले हुए तिल देकर बदले में काले तिल लेना चाहती है, तो उसके पीछे अवश्य ही कोई कारण होना चाहिए।
एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। एक दिन प्रातःकाल ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से कहा आज दक्षिणायन संक्रान्ति है, आज दान करने का बहुत अच्छा फल मिलता है मैं इसी आशा से जा रहा हूँ। तुम किसी एक ब्राह्मण को भोजन करा देना। पति की यह बात सुनकर ब्राह्मणी बोली, “क्या तुम्हें यह सब कहते शर्म नहीं आती? इस ग़रीब घर में रखा ही क्या है, जो किसी को भोजन कराया जाए? ना ही हमारे पास पहनने को कोई अच्छे कपड़े हैं, ना कोई सोना- चाँदी। हम भला क्या ही किसी को कुछ दान देंगे!”
पत्नी के कठोर वचन सुनकर ब्राह्मण ने कहा, “तुम्हारा यह सब कहना उचित नहीं है। धन तो आज तक किसी को भी नहीं मिला। हमारे पास जितना है उसमें से थोड़ाकुछ किसी जरूरतमन्दको देना ही सच्चा दान है।”
पति के इस प्रकार समझाने-बुझाने पर ब्राह्मणी बोली, “ठीक है। घर में थोड़े-से तिल रखे हैं, मैं उनके छिलके उतार लेती हूँ उनसे ही किसी ब्राह्मण को भोजन करा दूँगी।”
पत्नी से आश्वासन मिलते ही ब्राह्मण दूसरे गाँव दान लेने चला गया। इधर ब्राह्मणी ने तिलों को कूटा, धोया और सूखने के लिए उन्हें धूप में रख दिया। तभी एक कुत्ते ने धूप में सूख रहे तिलों पर पेशाब कर दिया। ब्राह्मणी सोचने लगी, यह तो कंगाली में आटा गीला वाली बात हो गई। अब किसी को अपने धुले तिल देकर उससे बिना धुले तिल लाने की कोशिश करती हूँ।
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सर्वेषामेव मत्त्याँनां व्यसने समुपस्थिते।
वाङ्मात्रेणापि साहाय्यं मित्रादन्यो ना सन्दधे॥
अर्थात् संकट के समय मौखिक आश्वासन भी केवल मित्र से ही मिल सकता है, जैसे सिर्फ़ चित्रग्रीव के कहने मात्र से हिरण्यक ने अपने मित्र की मदद कर दी थी।
एक वन में एक बरगद के पेड़ के सहारे कई पक्षी और जानवर रहते थे। उसी बरगद पर लघुपतनक नाम का एक कौआ भी रहता था। एक दिन वो जैसे ही भोजन की खोज में निकला तो उसने हाथ में जाल लिये एक शिकारी को उस बरगद की ओर आते देखा। वह सोचने लगा कि यह दुष्ट तो मेरे साथी पक्षियों को अपना शिकार बनाने यहाँ आया है। मैं सभी को सावधान कर देता हूँ।
यह सोचकर वह वापस लौट आया और अपने सभी साथियों को इकट्ठा करके उन्हें बताने लगा- “बहेलिया अपना जाल फैलाकर यहाँ पर चावल बिखेरेगा और जो भी उन चावलों का लालच करेगा, वह जाल में अवश्य ही फँस जाएगा। इसलिए कोई भी चावलों के पास नहीं जाएगा।”
कुछ ही देर बाद, बहेलिये ने अपना जाल बिछाकर चावल फैला दिए और वह छिपकर एक ओर बैठ गया। ठीक इसी समय अपने परिवार के सदस्यों के साथ भोजन की खोज में निकले चित्रग्रीव नामक कबूतर ने जब उन चावलों को देखा, तो उसे लालच हो आया। कौए ने चित्रग्रीव को रोकना चाहा, लेकिन चित्रग्रीव ने कौए की एक ना सुनी और चावलों को खाने के चक्कर में पूरे परिवार के साथ जाल में फँस गया।
बहेलिया कबूतरों को अपने जाल में फँसा देखकर प्रसन्न होकर उन्हें पकड़ने के लिए उनकी ओर चला। लेकिन बहेलिए को अपनी ओर आता देखकर कबूतरों के मुखिया ने अपने परिजनों को समझाते हुए कहा -
“तुम सब इस जाल को लेकर थोड़ी दूर तक उड़ चलो, तब तक मैं इस जाल से मुक्त होने का कोई उपाय सोचता हूँ। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे, तो बहेलिए के हाथों में पड़कर अवश्य मारे जाओगे।”
अपने मुखिया की बात मानकर सभी कबूतरों ने एक साथ अपने पंख फड़फड़ाए और जाल को साथ लेकर उड़ने लगे। कबूतरों को जाल के साथ उड़ता देख, बहेलिया उनके पीछे भागा और कहने लगा, “कब तक एक साथ उड़ पाओगे कुछ देर में ही तुम सब आपस में लड़ने लगोगे और नीचे गिर जाओगे।”
पर कबूतर एक साथ उड़ते रहे और देखते ही देखते आसमान में ऊँचे उड़ गए। दुःखी हुआ बहेलिया अपने भाग्य को कोसता हुआ लौट गया।
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मूर्ख बंदर और राजा
किसी राजा का एक भक्त और विश्वासपात्र एक बंदर था। राजा ने उस बंदर को अपना अंगरक्षक नियुक्त कर रखा था और उसे राजमहल में कहीं भी बेरोक-टोक आने-जाने की अनुमति थी।
एक दिन राजा सो रहा था और बंदर उसके पास खड़ा पंखा लेकर हवा कर रहा था। सोते हुए राजा की छाती पर एक मक्खी बैठ गयी। पंखे से बार-बार दूर हटाने पर भी वह बार-बार वहीं बैठती रही।
तब उस मूर्ख बंदर ने एक पैनी तलवार से मक्खी पर प्रहार कर दिया। मक्खी तो उड़ गयी परन्तु राजा की छाती के दो टुकड़े हो गए और राजा वहीं मर गया।
इसीलिए कहते हैं मूर्ख से मित्रता हानिकारक हो सकती है।
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किसी नगर में जीर्णधन नामक एक व्यापारी रहता था। धन खत्म हो जाने पर उसने दूर देश व्यापार के लिए जाने की सोची।
उसके पास उसके पूर्वजों की एक बड़ी भारी लोहे की तराजू थी। उसे एक सेठ के घर गिरवी रखकर वह परदेश चला गया। बहुत समय बीतने के बाद वह व्यापारी अपने नगर वापस लौटा और सेठ के पास जाकर बोला, “सेठ जी! आपके पास गिरवी रखी हुई मेरी तराजू मुझे वापस कर दीजिये।“ सेठ बोला, “भाई तुम्हारी तराजू तो नहीं है उसे चूहे खा गए।“ जीर्णधन बोला, “अब तराजू चूहे खा गए तो इसमें आपकी कोई गलती नहीं है।“
कुछ सोचकर जीर्णधन आगे बोला, “सेठजी! मैं अभी नदी किनारे स्नान करने जा रहा हूँ। मेरे पास इतना समान है इसलिए आप अपने बेटे को मेरे साथ भेज दीजिये।“ सेठजी ने भी सोचा कि ये ज्यादा देर यहाँ रहा तो कहीं उनकी चोरी खुल ना जाए, और अपने लड़के को जीर्णधन के साथ भेज दिया।
सेठ का बेटा खुशी से जीर्णधन का समान उठाकर उसके साथ चल दिया। जीर्णधन ने स्नान करने के बाद उस बालक को एक गुफा में बंद कर उसका दरवाजा एक बड़े पत्थर से बंद कर दिया। उसके बाद जीर्णधन अकेला ही अपने घर लौट आया। जब सेठ जी को अपना बेटा कहीं दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने पूछा, “अरे जीर्णधन! मेरा बेटा कहाँ है? वो तुम्हारे साथ नदी में स्नान करने गया था ना?” जीर्णधन बोला, “हाँ! पर उसे बाज उड़ाकर ले गया।“
सेठ बोला, “अरे झूठे! इतने बड़े बालक को क्या बाज उड़ाकर ले जा सकता है? मेरे बेटे को मुझे वापस कर दो वरना मैं राजसभा में शिकायत करूँगा।”
जीर्णधन बोला, “ओ सत्यवादी! जैसे बालक को बाज उड़ा नहीं सकता, वैसे ही लोहे की तराजू को चूहे नहीं खा सकते अगर अपना बेटा वापस चाहते हो तो मेरी तराजू लौटा दो।“
इस प्रकार दोनों का विवाद बढ़ गया और वो लड़ते हुए राजसभा में पहुँच गए। वहाँ पहुंचकर सेठ ने ऊंचे स्वर में बोला, “मेरे साथ घोर अन्याय हुआ है। इस दुष्ट ने मेरा बेटा चुरा लिया है।“
धर्माधिकारी ने जीर्णधन से सेठ का बेटा लौटाने को कहा तो वह बोला, “मैं क्या करूँ। मैं नदी में स्नान कर रहा था और मेरे देखते-दखते नदी के किनारे से बाज बालक को उड़ाकर ले गया।“
उसकी बात सुनकर धर्माधिकारी बोला, “तुम झूठ बोल रहे हो। क्या एक बाज बालक को उड़ाकर ले जाने में समर्थ है?”
जीर्णधन बोला, “जहाँ लोहे की तराजू को चूहे खा सकते हैं, वहाँ बाज बालक को उड़ा सकता है।“
यह कहकर उसने राजा को सारी बात बता दी। राजा ने सेठ को जीर्णधन की तराजू वापस करने को कहा और जीर्णधन ने सेठ का बेटा उसको वापस कर दिया।
इस प्रकार जीर्णधन ने अपनी चतुराई से अपनी तराजू वापस ले ली।
इसीलिए कहते हैंजिन लोगों की नीयत खराब हो उन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
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मूर्ख बगुला और केकड़ा
किसी जंगल में एक पेड़ पर बहुत सारे बगुले रहते थे। उसी पेड़ के कोटर में एक काला भयानक सांप रहता था। वह पंख न निकले हुए बगुले के बच्चों को खा जाता था। एक बार सांप को अपने बच्चों को खाता देखकर तथा उनके मरने से दुःखी होकर बगुला नदी की किनारे गया और आँखों में पानी भरकर सर नीचे कर बैठ गया।
उसको इस प्रकार देखकर एक केकड़ा उसके पास आया और पूछा, “मामा! क्या हुआ? आज तुम रो क्यों रहे हो?” बगुला बोला, “भद्र! क्या करूँ, पेड़ की कोटर में रहने वाले सांप ने मुझ अभागे के बच्चे खा लिए। इसी कारण मैं दुःखी होकर रो रहा हूँ। उस सांप के नाश का कोई उपाय हो तो बताओ।“
उसकी बात सुनकर केकड़े ने सोचा की यह तो हमारा दुश्मन है, इसको कुछ ऐसा उपाय बताता हूँ की इसके सारे बच्चे नष्ट हो जाएं। ऐसा सोचकर उसने कहा, “मामा! यदि ऐसा है तो तुम मछलियों के टुकड़े नेवले के बिल से सांप की कोटर तक डाल दो। ऐसा करने पर नेवला उस रास्ते जाकर सांप को मार डालेगा।“
बगुले ने वैसा ही किया। मछलियों के टुकड़े खाते-खाते नेवला सांप की कोटर तक पहुँच गया और सांप को देखकर उसे मार डाला। सांप को मारने के बाद नेवला उस पेड़ पर रहने वाले बगुलों को भी एक-एक कर खा गया।
इसीलिए कहते हैं कि कोई भी उपाय करने के पहले उसके परिणामों के विषय में भी सोच लेना चाहिए।
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धर्मबुद्धि और पापबुद्धि
किसी गाँव में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। एक दिन पापबुद्धि ने सोचा कि मैं तो मूर्ख हूँ, इसीलिए गरीब हूँ। क्यों न धर्मबुद्धि के साथ मिलकर विदेशों में जाकर व्यापार करूँ और फिर इसको ठगकर ढेर सारा धन कमा लूँ।
यह सोचकर एक दिन पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि से कहा, “हम इस गाँव में अपना समय व्यर्थ कर रहे हैं। क्यों न हम नगर में जाकर कुछ व्यापार करें?“ धर्मबुद्धि ने अपने मित्र की बात मान ली और उसके साथ नगर को चला गया।
दोनों ने कई दिनों तक नगर में रहकर व्यापार किया और अच्छा धन कमाया। एक दिन दोनों ने अपने गाँव वापस लौटने का मन बनाया। गाँव के समीप पहुँचने पर पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि से कहा, “मित्र! इतना सारा धन एक साथ घर ले जाना उचित नहीं है। क्यों न हम थोड़ा सा धन निकालकर बाकी यहीं कहीं धरती में गाड़ दें। आगे जब भी आवश्यकता होगी हम यहाँ आकर निकाल लिया करेंगे।“ उसकी बात धर्मबुद्धि ने मान ली।
एक रात पापबुद्धि जंगल में गया और गड्ढे से सारा धन निकलकर ले आया।
दूसरे दिन पापबुद्धि धर्मबुद्धि के घर गया और बोला, “मित्र! मेरा परिवार बहुत बड़ा है। मुझे अपना घर चलाने के लिए अधिक धन की आवश्यकता है, इसलिए हम जंगल जाकर कुछ धन निकाल लाते हैं।“ दोनों साथ में जंगल चले गए।
जब दोनों ने मिलकर उस स्थान पर खोदा जहाँ धन गड़ा हुआ था तो धन का पात्र खाली पाया। तब पापबुद्धि अपना सर पीटता हुआ बोला, “धर्मबुद्धि! तुमने ही यह धन चुराया है। तुम्हारे अतिरिक्त किसी और को इस स्थान का पता नहीं था। अब जल्दी से मेरा आधा भाग मुझे दे दो अन्यथा मेरे साथ राजसभा चलो, वहीं इसका निर्णय होगा।“
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