पंचतंत्र की कहानियां  Panchatantra ki Kahaniyan

पंचतंत्र की कहानियां Panchatantra ki Kahaniyan

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पंचतंत्र की कहानियां Panchatantra ki Kahaniyan episodes

  • मूर्ख बंदर और सूचीमुख पक्षी

    मूर्ख बंदर और सूचीमुख पक्षी

    नानाम्यं नमतजे दारु नाश्मनि स्यात्क्षुरक्रिया ।

    सूचीमुखं विजानीहि नाशिष्यायोपदिश्यते ॥

    “नहीं झुकने योग्य लकड़ी नहीं झुकती, पत्थर से दाढ़ी नहीं बनाई जा सकती और अशिष्य को उपदेश नहीं दिया जा सकता। सूचीमुख इसका उदाहरण है।“

    किसी पहाड़ी क्षेत्र के एक जंगल में बंदरों का एक झुंड रहता था। एक बार ठंड के मौसम में बारिश से भीग जाने के कारण वो ठिठुर रहे थे। किसी तरह ठंड से बचने के लिए उन्होंने आग जैसी दिखने वाली सुखी घास इकट्ठा की और उसमें फूँक मारकर गर्मी उत्पन्न करने का प्रयास करने लगे।

    उनको इस प्रकार घास के ढेर के चारों ओर बैठकर निरर्थक प्रयास करता देखकर सूचीमुख नाम का एक पक्षी उनके पास आकर बोला, “ये कैसी मूर्खता कर रहे हो। ऐसे आग नहीं जलती। यहाँ सर्दी से ठिठुरने की बजाय किसी गुफा को ढूंढकर उसके अंदर बैठकर अपनी जान बचाओ। बदल उमड़ रहे हैं, अभी और भी बारिश होगी।“

    उनमें से एक बूढ़े बंदर ने बोला, “तुम अपने काम से काम रखो। हमें तुम्हारे ज्ञान की आवश्यकता नहीं है।“

    पक्षी ने बूढ़े बंदर की बात अनसुनी कर दी और बार-बार वही बात कहने लगा, “अरे बंदरों! इस प्रकार व्यर्थ का प्रयास मत करो।“

    जब किसी तरह उसका प्रलाप शान्त नहीं हुआ तो अपना प्रयास व्यर्थ होने से क्रोधित एक बंदर ने उसके दोनों पंख पकड़कर उसे एक पत्थर पर पटक कर मार दिया।

    इसीलिए कहते हैं कि अयोग्य को शिक्षा देने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 

     

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    4 min
  • गौरैया और मतवाला हाथी

     

    चटकाकाष्ठकूटेन मक्षिकादर्दुरैस्तथा ।

    महाजनविरोधेन कुञ्जरः प्रलयं गतः ॥

    कठफोड़वा, गौरैया, मेढक तथा मक्खी जैसे महाजनों का विरोध करने से हाथी नष्ट हो गया था।

    किसी जंगल में चटक और चटकी नामक गौरैया का जोड़ा एक सदाबहार तमाल के पेड़ में घोंसला बनाकर रहते थे। कुछ समय बाद गौरैया ने उस घोंसले में अंडे दिए। एक दिन एक मतवाला हाथी कड़ी धूप से बचने के लिए उस घने पेड़ की छाया में आकर खड़ा हो गया। अपनी शक्ति के मद में चूर उसने पेड़ की जिस डाल में गौरैया का घोंसला था उसे अपनी सूंड से पकड़कर तोड़ दिया।

    डाल टूटने से गौरैया का घोंसला गिर गया और उसमें रखे चटकी के सारे अंडे फूट गए। चटकी अपने अंडों के फूटने के कारण रोने लगी। उसका रोना सुनकर उनका मित्र कठफोड़वा उनके पास आकर बोला, “क्यों बेकार में रो रही हो। गए हुओं को यादकर रोते नहीं हैं। हमें हमारे सामर्थ्य के अनुसार ही जीवन जीना पड़ता है।“

    उसकी बात सुनकर चटक ने कहा, “तुम्हारी बात सच है। परंतु उस मदमस्त हाथी ने अपने बल के अभिमानवश जो किया है उसे उसका दण्ड अवश्य मिलना चाहिए। तुम अगर मेरे सच्चे मित्र हो तो इस हाथी को दण्ड देने के कोई उपाय सोचो, उसके बाद ही हमारी संतान के मरने का दुःख दूर होगा।“

    उसके बाद कठफोड़वा अपनी वीणारवा नामक मक्खी मित्र के पास गया और उसे सारी बात बताई। मक्खी उन सबको लेकर अपने मेघनाद नाम के मेढक मित्र के पास लेकर गयी। सबने आपस में सलाह कर हाथी से छुटकारा पाने की एक युक्ति सोची।

    मेघनाद ने मक्खी से कहा, “मक्खी! कल दोपहर के समय तुम हाथी के कानों में अपनी वीणा की मधुर आवाज करना। उस संगीत की मधुरता के कारण वह अपनी आँखें बंद कर लेगा। जैसे ही वह अपनी आँखें बंद करेगा कठफोड़वा अपनी चोंच से उसकी आँखें फोड़ देगा। इस प्रकार अंधा हो जाने पर जब वो प्यास होकर पानी के पास जाने की सोचेगा तब मैं अपने परिवार के साथ गहरी खाई के पास जाकर जोर-जोर की आवाज करूँगा। अंधा होने के कारण हाथी तालाब समझकर वहाँ आएगा और खाई में गिरकर मर जाएगा।“

    इस प्रकार सभी ने मिलकर एक विशाल हाथी को भी अपनी चतुराई से नष्ट कर दिया।

    इसीलिए कहते हैं कि बुद्धि के प्रयोग से कमजोर लोग मिलकर बलशाली को पराजित कर सकते हैं। 

     

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    6 min
  • घमंडी मछली

    किसी तालाब में तीन मछलियाँ अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य रहती थीं। एक दिन उस तालाब को देखकर मछुआरों ने कहा, “अहो! इस तालाब में तो बहुत सारी मछलियाँ हैं। हम कल यहाँ जरूर आयेंगे।“ उनकी बातों को सुनकर अनागतविधाता ने सभी मछलियों को बुलाकर कहा, “क्या आपलोगों ने मछुआरों की बात सुनी? हमें उनसे बचने के लिए आज रात में पास के तालाब चले जाना चाहिये।“

    अनागतविधाता की बात सुनकर बाकी मछलियाँ बोलीं, “हम अपना घर छोड़कर किसी नई जगह नहीं जा सकते।“

    प्रत्युत्पन्नमति ने कहा, “किसी नई जगह में नई कठिनाइयाँ हो सकती हैं, हमें यहीं रहकर मछुआरों से बचने का प्रयास करना चाहिए।“

    यद्भविष्य बोली, “जो भाग्य में लिखा है वो तो होकर ही रहेगा। इस तरह कुछ भी प्रयास करना व्यर्थ है।“

    अनागतविधाता अपने परिवार को लेकर रात में ही दूसरे तालाब चली गयी।

    अगले दिन जब मछुआरों ने जाल बिछाया तो प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य के साथ अन्य मछलियाँ जाल में फंस गयीं।

    प्रत्युत्पन्नमति ने जाल में फंस जाने पर मरने का नाटक किया। मछुआरों ने मरी हुई मछली देखी तो उसे फिर से पानी में फेंक दिया और यद्भविष्य और अन्य मछलियों को लेकर चले गए।

    इसीलिए कहते हैं कि विपत्ति के लिए पहले से तैयारी करने वाले और विपत्ति आने पर उससे बचने का प्रयास करने वाले सुरक्षित रहे हैं और भाग्य पर सब कुछ छोड़ देने वाले नष्ट हो जाते हैं।

     

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    4 min
  • दुर्बुद्धि कछुआ और हंस

    किसी तालाब में कम्बुग्रीव नामक एक कछुआ रहता था। उसके संकट-विकट नाम के दो हंस परम स्नेही मित्र थे। एक बार वहाँ लंबे समय तक वर्षा नहीं होने के कारण, तालाब धीरे-धीरे सूखने लगा। एक दिन तीनों इसी विषय में आपस में बात कर रहे थे। कछुए ने कहा, “मित्रों! जल के अभाव में हमारा जीवन नहीं बचेगा। हमें अपनी जान बचाने का कुछ उपाय सोचना पड़ेगा।“

    हंसों ने कहा, “यहाँ से थोड़ी दूर पर एक दूसरा बड़ा तालाब है, जिसमें पानी भरा हुआ है। हम सबको वहीं चलना चाहिए।“

    इस पर कछुए ने कहा, “तुम दोनों कहीं से एक लकड़ी लेकर आओ। तुम दोनों उस लकड़ी को अपने पंजों से पकड़कर उड़ना और मैं उसे अपने दांतों से पकड़कर लटक जाऊँगा।“

    हंस बोले, “हम ऐसा ही करते हैं, लेकिन हवा में उड़ते समय तुम किसी भी हालत में अपना मुँह मत खोलना। अगर तुमने अपना मुँह खोला तो तुम नीचे गिरकर मर जाओगे।“

    इस प्रकार दोनों हंस एक लकड़ी में कछुए को लटकाकर उड़ चले। रास्ते में एक गाँव आया। गाँव वाले दोनों हंसों को इस प्रकार उड़ता हुआ देखकर आश्चर्य-चकित होकर कहने लगे, “अहो! देखो ये पक्षी क्या चक्र जैसी वस्तु लेकर उड़े जा रहे हैं।“

    उनकी बात सुनकर कछुए से रहा नहीं गया और वो बोला, “ये चक्र जैसी वस्तु मैं हूँ, कम्बुग्रीव।“

    कछुए के इस प्रकार मुँह खोलते ही वो नीचे गिर गया और इतनी ऊंचाई से गिरने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

    इसीलिए कहते हैं कि हितकारी लोगों की बात माननी चाहिए।

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    5 min
  • टिटिहरी और अहंकारी समुद्र

    किसी समुद्र के तट में एक टिटिहरी पक्षियों का एक जोड़ा रहता था। जब मादा टिटिहरी के अंडे देने का समय आया तो उसने नर टिटिहरी से कहा कि जल्दी से कोई शान्त जगह ढूँढे, जहाँ वह अंडे दे सके। नर टिटिहरी ने कहा, “यह समुद्र तट कितना सुंदर है, तुम यहीं अंडे दे दो।“ मादा बोली, “पूर्णिमा के दिन जो ज्वार आता है वो बड़े-बड़े हाथियों तक तो अपने साथ बहा ले जाता है। तुम जल्दी से कोई दूसरा स्थान खोजो।“ इस पर नर बोला, “बात तो तुम्हारी सत्य है पर इस समुद्र में ऐसा सामर्थ्य कहाँ जो मेरे बच्चों का कुछ बिगाड़ सके। तुम निश्चिंत होकर यहीं अंडे दो।“

    उधर समुद्र ने टिटिहरी की बातें सुनकर सोचा, “कितना कल्पित गर्व है इस पक्षी में कि रात में आकाश को सम्हालने के लिए पैर ऊपर करके सोता है। जरा देखें तो इसकी ताकत।“ ऐसा सोचकर समुद्र स्थिर हो गया और टिटिहरी ने समुद्र के किनारे अंडे दे दिए। अगले ही दिन जब टिटिहरी भोजन की खोज में गए हुए थे, समुद्र में ज्वार आया और वो टिटिहरी के अंडे बहाकर ले गया। जब दोनों पक्षी वापस आए तो अपने अंडे न देखकर मादा टिटिहरी क्रोध में बोली, “अरे मूर्ख! मैंने तुझसे कहा था की समुद्र के ज्वार में मेरे अंडे नष्ट हो जाएंगे इसीलिए कहीं दूर चलकर शान्त जगह में अंडे देते हैं, पर तूने अपनी बेवकूफी और अहंकार के कारण मेरी बात नहीं मानी।“

     

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    9 min
  • सिंह और ऊंट

    किसी जंगल में मदोत्कट नाम का एक सिंह रहता था। उसके सेवक गैंडा, कौवा और गीदड़ थे। एक दिन उन्होंने जंगल में इधर-उधर घूमते हुए अपने साथियों से बिछड़ा हुआ क्रथनक नाम का एक ऊंट देखा। ऊंट को देखकर सिंह बोला, “अहो! यह तो बड़ा ही सुंदर जीव है। पता लगाया जाए की यह पालतू है या जंगली।“ यह सुनकर कौआ बोला, “स्वामी! ऊंट नाम का यह पालतू पशु आपका भोजन है। आप इसे तुरंत मार डालिये।“ सिंह बोला, “नहीं! मैं अपने घर आये हुए को नहीं मरूँगा। तुम लोग उसको अभयदान देकर मेरे पास लेकर आओ जिससे मैं उसके यहाँ आने का कारण पूछ सकूँ।“

    सिंह की बात मानकर उसके साथी किसी तरह ऊंट को विश्वास दिलाकर मदोत्कट के पास ले आए। तब सिंह के पूंछने पर ऊंट ने उसे अपने बारे में सब कुछ बता दिया कि कैसे वह गाँव में अपने मालिक के लिए भार उठाता है और आज किसी तरह अपने साथियों से भटककर यहाँ जंगल में पहुँच गया है। ऊंट की बातें सुनकर सिंह बोला, “क्रथनक भाई! अब तुम्हें गाँव वापस जाकर बोझ उठाने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम अब यहीं हमारे साथ जंगल में रहो और बिना किसी डर के हरी घास का सुख भोगो।“

    उसके बाद मदोत्कट के संरक्षण में वह ऊंट बिल्कुल निडर होकर जंगल में रहने लगा।

     

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    10 min
  • रंगा सियार

    किसी जंगल में चंडरव नामक एक सियार रहता था। वह एक बार भूख से व्याकुल होकर खाने की खोज में किसी नगर में जा पहुंचा। नगर में रहने वाले कुत्ते उसे देखकर भौंकते हुए उसके पीछे दौड़े। उनसे अपनी जान बचाने के लिए सियार भाग कर पास ही एक धोबी के घर में घुस गया। वहाँ नील के पानी से भरा एक नांद तैयार रखा था। कुत्तों से डरा हुआ सियार हड़बड़ी में उस नांद में गिर गया। जब वह उस नांद ने निकला तो नीले रंग को हो जाने के कारण कुत्तों ने उसे नहीं पहचाना और उसके पीछे नहीं भागे। नीले रंग से रंगा हुआ सियार धीरे-धीरे जंगल पहुंचा।

    जंगल के सभी जानवर नीले रंग के सियार को देखकर अचंभित हो गए और डर के कारण इधर-उधर भागने लगे। यहाँ तक कि बड़े-बड़े हाथी और भयानक सिंह भी इस नए जानवर से भयभीत थे। उनको डरा हुआ देखकर चंडरव बोला, “हे जंगल के जीवों! तुम मुझे देखकर भाग क्यों रहे हो? मुझसे डरो मत। ब्रह्मदेव ने आज ही मेरा निर्माण किया है और मुझे जंगल के सभी जीवों का राजा बनाकर यहाँ भेजा है। मेरा नाम ककुद्द्रुम है और स्वयं ब्रह्मदेव की आज्ञा से मैं तुम सब का राजा हूँ।“

    उसकी बात सुनकर सभी जानवरों ने कहा, “स्वामी! आज्ञा दीजिये।“

     

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    5 min
  • सिंह और चतुर खरगोश

    किसी जंगल में भासुरक नाम का एक सिंह रहता था। वह बलवान होने के कारण रोज अनेक हिरण, खरगोश आदि जानवरों को मारकर भी शान्त नहीं होता था। एक दिन उस जंगल के सारे जीव मिलकर उसके पास गए और बोले, “स्वामी! इन सारे जीवों को मारने से क्या लाभ? आपकी तृप्ति तो एक हिरण से ही हो जाती है। इसलिए आप हमारे साथ संधि कर लीजिये। आज से घर बैठे आपके पास क्रम से रोज एक जीव खाने के लिए पहुँच जाया करेगा। ऐसा करने से आपकी जीविका भी बिना कष्ट के चलेगी और हमारा नाश भी नहीं होगा।“

    उनकी बात सुनकर भासुरक बोला, “ये तुमने ठीक कहा। परंतु याद रहे अगर किसी दिन मेरे पास खाने के लिए एक जीव नहीं आया तो मैं सबको खा जाऊँगा।“ सभी जानवरों ने “ऐसा ही होगा” कहकर वहाँ से विदा ली और उसके बाद बिना भय के जंगल में रहने लगे। रोज दोपहर को एक जीव सिंह के पास पहुँच जाता था। 

    एक दिन सिंह के पास जाने का क्रम खरगोश का था। खरगोश अपनी मृत्यु के डर से धीरे-धीरे चलते हुए किसी तरह सिंह को मारकर अपनी जान बचाने के उपाय सोचने लगा। रास्ते में उसे एक कुआं दिखा। उसने झाँककर देखा तो उसे अपनी परछाई दिखाई दी। इससे खरगोश को सिंह से छुटकारा पाने का एक उपाय सूझा। 

    खरगोश धीरे-धीरे चलता हुआ शाम के समय सिंह के पास पहुंचा। भासुरक भूख से व्याकुल हो रहा था और छोटे से खरगोश को देखकर उसका क्रोध और भी बढ़ गया और उसने खरगोश से कहा, “अरे नीच! एक तो इतने छोटे हो और दूसरे इतनी देरी से आये हो। इस अपराध के लिए मैं तुमको खाने के बाद सुबह सभी हिरणों को मारकर इसका दंड दूंगा।“ 

    खरगोश ने दबी हुई आवाज में कहा, “स्वामी! इसमें न मेरा अपराध है और न ही बाकी जानवरों का।“

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    8 min
  • धूर्त बगुला

    किसी जंगल में अनेक जल-जन्तुओं से भरा एक तालाब था। वहाँ रहने वाला एक बगुला बूढ़ा हो जाने के कारण मछलियाँ पकड़ने में असमर्थ हो गया था। भूख से व्याकुल हो जाने के कारण वह नदी के किनारे बैठा आँसू बहाकर रो रहा था। समय एक केकड़े ने उसे रोता देखकर उत्सुकता और सहानुभूति के साथ पूछा, “मामा! आज तुम अपने भोजन की खोज छोड़कर यहाँ बैठे आँसू क्यों बहा रहे हो?”

    बगुला बोला, “तुम सही कह रहे हो। मछलियों को खाने से मुझे वैराग्य हो गया है। अब मैं आमरण व्रत ले लिया है।“ केकड़े ने कहा, “मामा! तुम्हारे इस वैराग्य का कारण क्या है?” 

    बगुले ने उत्तर दिया, ”मैं इसी तालाब में पैदा हुआ और यहीं बूढ़ा हुआ। परंतु आज ही मैंने सुन है कि अगले बारह वर्ष तक वर्षा नहीं होगी। इस कारण अब यह तालाब सूख जाएगा और इसमें रहने वाले सभी प्राणी मृत्यु को प्राप्त होंगे। बस इसी दुःख से मैं दुखी हूँ।“

    केकड़े ने तालाब में रहने वाले और भी जंतुओं को बगुले की कही हुई बात बताई। डर से व्याकुल होकर सभी प्राणी उस बगुले के पास आए और एक स्वर में बोले, “मामा! क्या हमारे बचने का कोई उपाय है?” बगुला बोला, “इस तालाब से थोड़ी ही दूर पर एक बहुत बड़ा तालाब है। उसमें इतना पानी है कि बारह वर्ष तो क्या चौबीस वर्षों तक भी अगर वर्षा ना हो तो भी नहीं सूखेगा। अगर तुम लोग चाहो तो मैं एक-एक कर तुम सभी तो उस तालाब में ले जाकर छोड़ देता हूँ।“ 

    इस प्रकार बगुला रोज कुछ मछलियाँ तालाब से ले जाता और उनको एक चट्टान में ले जाकर खा लेता। ऐसा कई दिनों तक चलता रहा और बगुले बिना किसी प्रयास के भर पेट भोजन मिलने लगा। 

    एक दिन केकड़े ने बगुले से कहा, “मामा! मेरी बात आपसे सबसे पहले हुई थी और अभी तक आपने मुझे उस बड़े तालाब में नहीं छोड़ा। आप कृपा करके मेरे प्राणों की भी रक्षा करें।“

    दुष्ट बगुले ने सोचा, “रोज-रोज मछलियाँ खाकर मेरा भी मन भर गया है। आज इस केकड़े को ही खाता हूँ।“ ऐसा सोचकर उसने केकड़े को अपनी पीठ पर बिठा लिया और चट्टान की ओर उड़ने लगा। 

    केकड़े ने दूर से चट्टान पर मछलियों की हड्डियों का ढेर देखा तो डर गया और बगुले से बोला, “मामा! वह दूसरा तालाब कितनी दूर है? मुझे अपने ऊपर इतनी देर से बिठाकर तुम थक गए होगे।“

    बगुले ने भी सोचा यह जल में रहने वाला केकड़ा यहाँ मेरा क्या बिगाड़ लेगा और बोला, “केकड़े! दूसरा कोई तालाब नहीं है। यह तो मैंने मेरे भोजन का प्रबन्ध किया है। आज तू भी मेरा भोजन बनेगा।“ 

    उसके ऐसा कहने पर केकड़े ने अपने दांतों से उसकी गर्दन जकड़ ली, जिससे वह दुष्ट बगुला मर गया। 

    बगुले के मर जाने के बाद केकड़ा धीरे-धीरे तालाब वापस पहुंचा और सभी तो बगुले की धूर्तता के विषय में बताया। 

    इसीलिए कहते हैं कि कभी भी चपलतावश अधिक नहीं बोलना चाहिए। 

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    6 min
  • कौआ और सोने का हार

    किसी स्थान में एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था। वहाँ एक कौआ और कौवी रहते थे। कौवी जब भी अंडे देती पेड़ के नीचे बिल में रहने वाला काला सांप उन अंडों को खा जाता। इस बात से दुखी होकर वो अपने मित्र सियार के पास जाकर बोले, “मित्र! ऐसी परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए? हम उस भयानक सांप से अपने बच्चों की रक्षा कैसे करें, इसका कुछ उपाय बताइये।“

    सियार ने कौवे की बात सुनकर उससे कहा, “जिस शत्रु से लड़कर नहीं जीता जा सकता, उससे चतुराई से जीतना चाहिए। हमें इस सांप से मुक्ति का कुछ उपाय सोचना पड़ेगा।“ सियार ने कौआ और कौवी को सांप को मारने का एक उपाय सुझाया। 

    सियार की बात मानकर कौआ और कौवी किसी धनवान व्यक्ति को ढूंढने लगे। उनकी दृष्टि पास में ही तालाब पर नहाते हुए राजा पर पड़ी। राजा के वस्त्र और आभूषण तालाब के किनारे पर रखे हुए थे। कौवी ने एक सोने का हार अपनी चोंच में दबाया और उड़ गया। राजा के रक्षक उसके पीछे-पीछे भागे। कौवी ने वह हार बरगद के पेड़ के नीचे के सांप के बिल में डाल दिया। 

    जब सैनिक वह हार लेने के लिए बिल के पास गए तो उन्हें भयानक काला सांप दिखा। सैनिकों ने उस सांप को मार डाला और हार लेकर चले गए। 

    इस प्रकार सांप के मर जाने के बाद कौआ और कौवी अपने घोंसले में सुख से रहने लगे। 

    इसीलिए कहते हैं कि जो काम चतुराई से हो सकता है वहाँ बल प्रयोग नहीं करना चाहिए। 

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    4 min

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