निर्मला बड़ी मधुर-भाषणी स्त्री थी, पर अब उसकी गणना
कर्कशाओ में की जा सकती थी। दिन भर उसके मुख से जली-कटी बातें निकला करती थी। उसके शब्दों की
कोमलता न जाने क्या हो गई! भावों में माधुयर्म का कही नाम नही। भूंगी बहुत दिनों से इस घर मे नौकर थी।
स्वभाव की सहनशील थी, पर यह आठों पहर की बकबक उससे भी न सकी गई। एक दिन उसने भी घर की राह
ली। यहां तक कि जिस बच्ची को प्राणों से भी अधिक प्यार करती थी, उसकी सूरत से भी घृणा हो गई। बात-
बात पर घुड़क पड़ती, कभी-कभी मार बैठती। रुक्मणी रोई हुई बालिका को गोद में बैठा लेती और चुमकार-
दुलार कर चुप कराती। उस अनाथ के लिए अब यही एक आश्रय रह गया था।