रामकुटी (Ramkuti)

रामकुटी (Ramkuti)

By Shrikant BorkarBusinessManagement
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रामकुटी (Ramkuti) episodes

  • सूर्यकवचम स्तोत्र | स्वर : कु आर्या वडाळकर
    सूर्यकवचम:याज्ञवल्क्य उवाच-श्रणुष्व मुनिशार्दूल सूर्यस्य कवचं शुभम्।शरीरारोग्दं दिव्यं सव सौभाग्य दायकम्।1।याज्ञवल्क्यजी बोले- हे मुनि श्रेष्ठ! सूर्य के शुभ कवच को सुनो, जो शरीर को आरोग्य देने वाला है तथा संपूर्ण दिव्य सौभाग्य को देने वाला है।देदीप्यमान मुकुटं स्फुरन्मकर कुण्डलम।ध्यात्वा सहस्त्रं किरणं स्तोत्र मेततु दीरयेत् ।2।चमकते हुए मुकुट वाले डोलते हुए मकराकृत कुंडल वाले हजार किरण (सूर्य) को ध्यान करके यह स्तोत्र प्रारंभ करें।शिरों में भास्कर: पातु ललाट मेडमित दुति:।नेत्रे दिनमणि: पातु श्रवणे वासरेश्वर: ।3।मेरे सिर की रक्षा भास्कर करें, अपरिमित कांति वाले ललाट की रक्षा करें। नेत्र (आंखों) की रक्षा दिनमणि करें तथा कान की रक्षा दिन के ईश्वर करें।ध्राणं धर्मं धृणि: पातु वदनं वेद वाहन:।जिव्हां में मानद: पातु कण्ठं में सुर वन्दित: ।4।मेरी नाक की रक्षा धर्मघृणि, मुख की रक्षा देववंदित, जिव्हा की रक्षा मानद् तथा कंठ की रक्षा देव वंदित करें।सूर्य रक्षात्मकं स्तोत्रं लिखित्वा भूर्ज पत्रके।दधाति य: करे तस्य वशगा: सर्व सिद्धय: ।5।सूर्य रक्षात्मक इस स्तोत्र को भोजपत्र में लिखकर जो हाथ में धारण करता है तो संपूर्ण सिद्धियां उसके वश में होती हैं।सुस्नातो यो जपेत् सम्यग्योधिते स्वस्थ: मानस:।सरोग मुक्तो दीर्घायु सुखं पुष्टिं च विदंति ।6।स्नान करके जो कोई स्वच्छ चित्त से कवच पाठ करता है वह रोग से मुक्त हो जाता है, दीर्घायु होता है, सुख तथा यश प्राप्त होता है
    3 min
  • रामाष्टक /स्वर :सौ रत्नमाला ताई
    श्री राम अष्टकम भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम् ।स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम् ॥ १ ॥जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकं । स्वभक्तभीतिभञ्जनं भजे ह राममद्वयम् ॥ २ ॥ निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम् । समं शिवं निरञ्जनं भजे ह राममद्वयम् ॥ ३ ॥सहप्रपञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम् । निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम् ॥ ४ ॥निष्प्रपञ्चनिर्विकल्पनिर्मलं निरामयम् । चिदेकरूपसन्ततं भजे ह राममद्वयम् ॥ ५ ॥ भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम् । गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम् ॥ ६ ॥महावाक्यबोधकैर्विराजमानवाक्पदैः । परं ब्रह्मसद्व्यापकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ७ ॥ शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम् । विराजमानदेशिकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ८ ॥
    रामाष्टकं पठति यस्सुखदं सुपुण्यं । व्यासेन भाषितमिदं शृणुते मनुष्यः ॥ ९ ॥विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं । संप्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥ १० ॥


    4 min
  • लाल मेरी सुरंग चूनरी भींजे। स्वर सेवा: *किशोरी दासी (अंजुना जी)
    *जय गौर हरि*

    *लाल मेरी सुरंग चूनरी भींजे।*
    लेहु बचाय आप पिय मोकों
    बूंद परे रंग छीजे।
    बरखत मेह रहे नहीं नेंक हु
    कहा उपाय अब कीजे।
    हम तुम कुंजभवन में चलिये
    मान सबे सुख लीजे।।2।।
    ऐसो समयो बोहोर न व्हे
    हे मेरो कह्यो पतीजे।
    श्रीविट्ठल गिरिधरन छबीले
    निरख-निरख मुख जीजे।।3।।

    स्वर सेवा: *किशोरी दासी (अंजुना जी)*
    3 min
  • मैं कैसे आऊ बुंधन मे भिगे मोरी सारी स्वर सेवा: *किशोरी दासी (अंजुना जी)*

    *सावन का पद*

    मैं कैसे आऊँ बूंदन भीगे मोरी सारी
    कैसे आऊँ कैसे आऊँ कैसे आऊँ कैसे आऊँ

    इक घन गरजे,दूजे पवन झकोरे
              तीजे यमुना जल भारी...

    इक गोरी दूजे,दधि की मटुकिया
               तीजे रैन अंधियारी..

    सूरदास प्रभु,बेसर उरझी
                ललन आये सम्वारी

    मैं कैसे आऊँ बूंदन भीगे मोरी सारी

    स्वर सेवा: *किशोरी दासी (अंजुना जी)*
    3 min

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