Suno Kahaniyan

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Suno Kahaniyan episodes

  • Kavi ka chunav- Sudarshan
    https://youtu.be/VXRC5_2wcSs Kavi ka Chunav-Sudarshan. महाराज ने अपने मंत्री से कहा,‘‘हमें अपने दरबार के लिए एक कवि की ज़रूरत है, जो सचमुच कवि हो.’’
    दूसरे दिन नौजवान मंत्री ने नगर में मुनादी करा दी. तीसरे दिन एक हज़ार एक आदमी मंत्री के महल के नीचे खड़े थे, और कहते थे, हम सब कवि हैं. मंत्री ने इक्कीस दिनों में उन सबकी कविताएं सुनीं और देखा, मगर उनमें सर्वश्रेष्ठ कौन है, इसका फ़ैसला न कर सका. उसने एक दिन सोचा, दो दिन सोचा, तीन दिन सोचा, चौथे दिन उसने फूल की पंखुड़ियों के काग़ज़ पर सुनहरे रंग से एक हज़ार एक कवियों के नाम लिखे, और यह सुनाम-सूची महाराज की सेवा में उपस्थित कर दी.
    महाराज को हैरानी हुई. बोले,‘‘क्या यह सब कवि हैं?’’
    मंत्री ने विनय से सिर झुकाया, और धीरे से जवाब दिया,‘‘मैंने उनकी कृतियां सुनी हैं, और इसके बाद यह नामावली तैयार की है. हमें एक कवि की ज़रूरत है, और यह एक हज़ार एक हैं. मैं चुनाव नहीं कर सका.’’
    8 min
  • Chhadaanta Hathi-Jataka Katha छद्दन्त हाथी-जातक कथा
    https://youtu.be/swHqnNmfazc Chhadaanta Hathi-Jataka Katha
    छद्दन्त हाथी-जातक कथा
    हिमालय के घने वनों में कभी सफेद हाथियों की दो विशिष्ट प्रजातियाँ हुआ करती थीं - छद्दन्त और उपोसथ। छद्दन्त हाथियों का रंग सफेद हुआ करता था और उनके छ: दाँत होते थे। (ऐसा पालि साहित्य मे उल्लिखित है।) छद्दन्त हाथियों का राजा एक कंचन गुफा में निवास करता था। उसके मस्तक और पैर माणिक के समान लाल और चमकीले थे। उसकी दो रानियाँ थी - महासुभद्दा और चुल्लसुभद्दा।
    एक दिन गजराज और उसकी रानियाँ अपने दास-दासियों के साथ एक सरोवर में जल-क्रीड़ा कर रहे थे। सरोवर के तट पर फूलों से लदा एक साल-वृक्ष भी था। गजराज ने खेल-खेल में ही साल वृक्ष की एक शाखा को अपनी सूंड से हिला डाला। संयोगवश वृक्ष के फूल और पराग महासुभद्दा को आच्छादित कर गये। किन्तु वृक्ष की सूखी टहनियाँ और फूल चुल्लसुभद्दा के ऊपर गिरे। चुल्लसुभद्दा ने इस घटना को संयोग न मान, स्वयं को अपमानित माना। नाराज चुल्लसुभद्दा ने उसी समय अपने पति और उनके निवास का त्याग कर कहीं चली गई। तत: छद्दन्तराज के अथक प्रयास के बावजूद वह कहीं ढूंढे नहीं मिली।
    कालान्तर में चुल्लसुभद्दा मर कर मद्द राज्य की राजकुमारी बनी और विवाहोपरान्त वाराणसी की पटरानी। किन्तु छद्दन्तराज के प्रति उसका विषाद और रोष इतना प्रबल था कि पुनर्जन्म के बाद भी वह प्रतिशोध की आग में जलती रही। अनुकूल अवसर पर उसने राजा से छद्दन्तराज के दन्त प्राप्त करने को उकसाया। फलत: राजा ने उक्त उद्देश्य से कुशल निषादों की एक टोली बनवाई जिसका नेता सोनुत्तर को बनाया।
    सात वर्ष, सात महीने और सात दिनों के पश्चात् सोनुत्तर छद्दन्तराज के निवास-स्थान पर पहुँचा। उसने वहाँ एक गड्ढा खोदा और उसे लकड़ी और पत्तों से ढ्ँक दिया। फिर वह चुपचाप पेड़ों की झुरमुट में छिप गया। छद्दन्तराज जब उस गड्ढे के करीब आया तो सोनुत्तर ने उस पर विष-बुझा बाण चलाया। बाण से घायल छद्दन्त ने जब झुरमुट में छिपे सोनुत्तर को हाथ में धनुष लिये देखा तो वह उसे मारने के लिए दौड़ा । किन्तु सोनुत्तर ने संन्यासियों का गेरुआ वस्र पहना हुआ था जिस के कारण गजराज ने निषाद को जीवन-दान दिया। अपने प्राणों की भीख पाकर सोनुत्तर का हृदय-परिवर्तन हुआ। भाव - विह्मवल सोनुत्तर ने छद्दन्त को सारी बातें बताई कि क्यों वह उसके दांतों को प्राप्त करने के उद्देश्य से वहाँ आया था।
    चूँकि छद्दन्त के मजबूत दांत सोनुत्तर नहीं काट सकता था इसलिए छद्दन्त ने मृत्यु-पूर्व स्वयं ही अपनी सूँड से अपने दांत काट कर सोनुत्तर को दे दिये।
    वाराणसी लौट कर सोनुत्तर ने जब छद्दन्त के दाँत रानी को दिखलाये तो रानी छद्दन्त की मृत्यु के आघात को संभाल न सकी और तत्काल मर गयी।
    4 min
  • MahaKapi ka balidan -Jataka Katha
    https://youtu.be/YItojCJzydM हिमालय के फूल अपनी विशिष्टताओं के लिए सर्वविदित हैं। दुर्भाग्यवश उनकी अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही हैं। कुछ तो केवल किस्से- कहानियों तक ही सिमट कर रह गयी हैं। यह कहानी उस समय की है, जब हिमालय का एक अनूठा पेड़ अपने फलीय वैशिष्ट्य के साथ एक निर्जन पहाड़ी नदी के तीर पर स्थित था। उसके फूल बड़े, अधिक रसीले और अधिक मीठे भी होते थे। उनकी आकृति और सुगंध भी मन को मोह लेने वाली थी।
    उस पेड़ पर वानरों का एक झुण्ड रहता था, जो बड़ी ही स्वच्छंदता के साथ उन फूलों का रसास्वादन व उपभोग करता था। उन वानरों का एक राजा भी था जो अन्य बन्दरों की तुलना कई गुणा ज्यादा बड़ा, बलवान्, गुणवान्, प्रज्ञावान् और शीलवान् था, इसलिए वह महाकपि के नाम से जाना जाता था। अपनी दूर-दृष्टि उसने समस्त वानरों को सचेत कर रखा था कि उस वृक्ष का कोई भी फल उन टहनियों पर न छोड़ा जाए जिनके नीचे नदी बहती हो। उसके अनुगामी वानरों ने भी उसकी बातों को पूरा महत्तव दिया क्योंकि अगर कोई फल नदी में गिर कर और बहकर मनुष्य को प्राप्त होता तो उसका परिणाम वानरों के लिए अत्यंत भयंकर होता।
    एक दिन दुर्भाग्यवश उस पेड़ का एक फल पत्तों के बीचों-बीच पक कर टहनी से टूट, बहती हुई उस नदी की धारा में प्रवाहित हो गया।
    उन्हीं दिनों उस देश का राजा अपनी औरतों दास-दासीयों तथा के साथ उसी नदी की तीर पर विहार कर रहा था। वह प्रवाहित फल आकर वहीं रुक गया। उस फल की सुगन्ध से राजा की औरतें सम्मोहित होकर आँखें बंद कर आनन्दमग्न हो गयीं। राजा भी उस सुगन्ध से आनन्दित हो उठा। शीघ्र ही उसने अपने आदमी उस सुगन्ध के स्रोत के पीछे दौड़ाये। राजा के आदमी तत्काल उस फल को नदी के तीर पर प्राप्त कर पल भर में राजा के सम्मुख ले आए। फल का परीक्षण कराया गया तो पता चला कि वह एक विषहीन फल था। राजा ने जब उस फल का रसास्वादन किया तो उसके हृदय में वैसे फलों तथा उसके वृक्ष को प्राप्त करने की तीव्र लालसा जगी। क्षण भर में सिपाहियों ने वैसे फलों पेड़ को भी ढूँढ लिया। किन्तु वानरों की उपस्थिति उन्हें वहाँ रास नहीं आयी। तत्काल उन्होंने तीरों से वानरों को मारना प्रारम्भ कर दिया।
    वीर्यवान् महाकपि ने तब अपने साथियों को बचाने के लिए कूदते हुए उस पेड़ के निकट की एक पहाड़ी पर स्थित एक बेंत की लकड़ी को अपने पैरों से फँसा कर, फिर से उसी पेड़ की टहनी को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर लेट अपने साथियों के लिए एक पुल का निर्माण कर लिया। फिर उसने चिल्ला कर अपने साथियों को अपने ऊपर चढ़कर बेतों वाली पहाड़ी पर कूद कर भाग जाने की आज्ञा दी। इस प्रकार महाकपि के बुद्धि कौशल से सारे वानर दूसरी तरफ की पहाड़ी पर कूद कर भाग गये।
    राजा ने महाकपि के त्याग को बड़े गौर से देखा और सराहा । उसने अपने आदमियों को महाकपि को जिन्दा पकड़ लाने की आज्ञा दी।
    उस समय महाकपि की हालत अत्यन्त गंभीर थी। साथी वानरों द्वारा कुचल जाने के कारण उसका सारा शरीर विदीर्ण हो उठा था। राजा ने उसके उपचार की सारी व्यवस्थता भी करवायी, मगर महाकपि की आँखें हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं।
    4 min
  • Mahan Matsya- Jataka Katha
    https://youtu.be/Yk0LY5wDEM0 Mahan Matsya-Jataka Katha
    महान् मत्स्य-जातक कथा
    श्रावस्ती के निकट जेतवन में कभी एक जलाशय हुआ करता था। उसमें एक विशाल मत्स्य का वास था। वह शीलवान्, दयावान् और शाकाहारी था।
    उन्हीं दिनों सूखे के प्रकोप के उस जलाशय का जल सूखने लगा। फलत: वहाँ रहने वाले समस्त जीव-जन्तु त्राहि-त्राहि करने लगे। उस राज्य के फसल सूख गये । मछलियाँ और कछुए कीचड़ में दबने लगे और सहज ही अकाल-पीड़ित आदमी और पशु-पक्षियों के शिकार होने लगे । अपने साथियों की दुर्दशा देख उस महान मत्स्य की करुणा मुखर हो उठी । उसने तत्काल ही वर्षा देव पर्जुन का आह्मवान् अपनी सच्छकिरिया के द्वारा किया। पर्जुन से उसने कहा, “हे पर्जुन अगर मेरा व्रत और मेरे कर्म सत्य-संगत रहे हैं तो कृपया बारिश करें।” उसकी सच्छकिरिया अचूक सिद्ध हुई। वर्षा देव ने उसके आह्मवान् को स्वीकारा और सादर तत्काल भारी बारिश करवायी।
    इस प्रकार उस महान और सत्यव्रती मत्स्य के प्रभाव से उस जलाशय के अनेक प्राणियों के प्राण बच गये।
    2 min
  • Kauvon ki kahani -Jataka Katha
    https://youtu.be/9KoZ_lU3-Jw kauvon ki kahani-Jataka Katha कौवों की कहानी-जातक कथा
    वर्षों पहले एक समुद्र में एक नर और एक मादा कौवा मदमस्त हो कर जल-क्रीड़ा कर रहे थे। तभी समुद्र की एक लौटती लहर में कौवी बह गयी, जिसे समुद्र की किसी मछली ने निगल लिया। नर कौवे को इससे बहुत दु:ख हुआ। वह चिल्ला-चिल्ला कर विलाप करने लगा। पल भर में सैंकड़ों कौवे भी वहाँ आ पहुँचे। जब अन्य कौवों ने उस दु:खद घटना को सुना तो वे भी जोर-जोर से काँव-काँव करने लगे।
    तभी उन कौवों में एक ने कहा कि कौवे ऐसा विलाप क्यों करे ; वे तो समुद्र से भी ज्यादा शक्तिशाली हैं। क्यों न वे अपनी चोंच से समुद्र के पानी को उठा कर दूर फेंक दें। सारे कौवों ने इस बात को समुचित जाना और अपनी-अपनी चोंचों के समुद्र का पानी भर दूर तट पर छोड़ने लगे। साथ ही वे कौवी की प्रशंसा भी करते जाते।
    एक कहता,” कौवी कितनी सुंदर थी।” दूसरा कहता, “कौवी की आवाज कितनी मीठी थी।” तीसरा कहता, “समुद्र की हिम्मत कैसे हुई कि वह उसे बहा ले जाय”। फिर कोई कहता, “हम लोग समुद्र को सबक सिखला कर ही रहेंगे।”
    कौवों की बकवास समुद्रको बिल्कुल रास न आयी और उसने एक शक्तिशाली लहर में सभी कौवों को बहा दिया।
    2 min
  • Somdant जातक कथा
    https://youtu.be/OdLYFsCNYqA सोमदन्त – जातक कथा (Jataka tales) हिमालय के जंगल में रहने वाले एक संन्यासी को अकेले हाथी का बच्चा मिला। उसने बच्चे पर दया की और उसे अपनी कुटिया में ले आया। कुछ ही दिनों में वह उस बच्चे पर मोहित हो गया और बड़े प्यार से उसकी देखभाल करने लगा। प्रेम के कारण वह उसे सोमदंत कहने लगा और उसके भोजन के लिए प्रचुर मात्रा में सामग्री जुटाता था। .....
    2 min
  • Nandivisal - Jataka Katha
    https://youtu.be/M3yUFGdRJRg Nandivisal - Jataka Katha. दान में प्राप्त बछड़े को एक ब्राह्मण ने बड़े ही ममत्व के साथ पाला - पोसा और उसका नाम नन्दीविसाल रखा। कुछ ही दिनों में वह बछड़ा एक बलिष्ठ बैल बन गया।.......
    3 min

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