सवेरे सुनहरी किरण की निधि
अपनी मुट्ठी में भींच चुपके से भागे थे
ये जाने क्यूँ दिन भर सूरज ने
पास तो तुम्हारे पूरा था
हमने थोड़ी सी ली थी
साँझ के नीले होते सियाही को देखा है
उसकी तरफ जो पीठ पीछे करते हो
ना जाने क्यूँ उससे मुंह फेरते हो
कान लगा गर जो बुदबुदाते हो
तो सुनो हमारी बात
किरण किरण जुटाए हैं हम
तो स्याह दीप्ती के संसार में आपका स्वागत है …. शुरुआत तो हो चुकी थी …पर हाँ इक जगह ते कर ली है..जाने कौन कौन सी रौशनी झांके कौन कौन से अँधेरे भागे.. . कोशिश है .. उम्मीद है .. :)