कोई रंग-रंगत-संगत-सार ना हो।
हो अगर कुछ तो बस बात इतनी सी ही कहे
जो भी रहे-जहाँ भी रहे- सबका होकर रहे।
कोई लड़ाई ना बढ़े-कोई युद्ध न हो अब
बेशक बीच हमारे कोई बुद्ध ना हो अब।
मेरे कहने से फ़र्क तो नहीं है पड़ता कोई
और ना ही वक्त को बदल सकता मेरा मन
फिर भी - हम सब मुक्त मन से खुला सोचते
हाथ बढ़ाते अमन की ओर, दरवाज़ा खोलते
कुछ फूल-पौधे उगाते और फसलें
हमारे सोचने भर से कितना कुछ हो जाता।
दो देश दो रहकर भी तो एक ही हो सकते
दो घर हों अलग तो भी एक आंगन तो रख सकते
हैं ये सब बातें सवालों जैसी और
हम कहाँ देख पाते हैं विश्व को
कभी ना समझे किसी झूठे मर्म पर
कभी जात पर तो कभी चेहरे के रंग पर
हम ही तो तालियाँ बजा रहे आँखे मूंद
सामने ही चल रहे दकियानूसी हुड़दंग पर।
दुनिया की एकता और वैश्विक प्रेम में
ये वैदिक मानुष बहुत कुछ कर सकते हैं
ये खाली हो चुके दरिया-ए-मुहब्बत को
बस हाथ थाम सबका-पल में भर सकते हैं।
बेकार के जालों में ना उलझें हम
दीवार न बनाएं हम-पुल बनाएं
जिसके नीचे से बहें काफिले
जिनके जीवन तितर-बितर हुए।
कुछ उधर रह गए और कुछ राह में ढह गये।
देश बंटता तो दिल भी तो टूट जाते हैं
जो रह गए इस-उस पार अब कहाँ मिल पाते हैं।
एक बस बिलखते उस बच्चे के चेहरे से
सीख सकते हैं हम, जो नहीं है करना
इतनी सी बात समझ लो दुनिया वालो