Truth For Life

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By Alethia4India
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Truth For Life episodes

  • 6 नवम्बर : वह हृदय जिसे परमेश्वर स्वीकार करता है
    “तब दाऊद भूमि पर से उठा, और नहाकर तेल लगाया, और वस्त्र बदला; तब यहोवा के भवन में जाकर दण्डवत की।” 2 शमूएल 12:20 जब दाऊद का वह बालक, जो बतशेबा के साथ उसके व्यभिचार के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था, बीमारी से ग्रस्त हुआ, तब राजा के भीतर एक ऐसी आत्मिक उत्कण्ठा जाग उठी जो मृतप्राय हो चुकी थी। दाऊद परमेश्वर की ओर मुड़ा और... Read More
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  • 5 नवम्बर : उसके उठे हुए हाथ
    “तब वह उन्हें बैतनिय्याह तक बाहर ले गया, और अपने हाथ उठाकर उन्हें आशीष दी; और उन्हें आशीष देते हुए वह उनसे अलग हो गया और स्वर्ग पर उठा लिया गया।” लूका 24:50-51 यीशु के पृथ्वी पर के आगमन को उसके प्रस्थान की ओर बढ़ती हुई यात्रा के रूप में समझा जा सकता है; स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर बालक बनकर जन्म लेने के बाद उसने... Read More
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  • 4 नवम्बर : मसीही जीवन के विषय में एक बड़ा झूठ
    “इस संसार के धनवानों को आज्ञा दे कि वे अभिमानी न हों और चंचल धन पर आशा न रखें, परन्तु परमेश्‍वर पर जो हमारे सुख के लिए सब कुछ बहुतायत से देता है।” 1 तीमुथियुस 6:17 सुसमाचार के विषय में हमारी संस्कृति में एक बड़ा झूठ प्रचलित है, और कभी-कभी हम, कलीसियाएँ और व्यक्तिगत विश्वासी भी, अनजाने में उसे बढ़ावा भी देते हैं। वह घातक... Read More
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  • 3 नवम्बर : क्या मसीहियों को दशमांश देना चाहिए?
    “पृथ्वी और जो कुछ उस में है यहोवा ही का है, जगत और उस में निवास करने वाले भी।” भजन संहिता 24:1 जब बाइबल आधारित प्रबन्धन और धन का विषय आता है, तो कौन सा मार्गदर्शक सिद्धान्त शीघ्र ही मन में आता है? सबसे सामान्य उत्तर निश्चय ही “दशमांश” है। और जबकि यह एक ऐसा शब्द है जो कलीसियाई जीवन की भाषा में ऐतिहासिक रूप... Read More
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  • 2 नवम्बर : सुसमाचार के मूलभूत घटक
    “जीवन की रोटी मैं हूँ : जो मेरे पास आता है वह कभी भूखा न होगा, और जो मुझ पर विश्‍वास करता है वह कभी प्यासा न होगा।” यूहन्ना 6:35 क्या आपकी कलीसिया ने कभी समुदाय के लिए कोई सेवा का कार्यक्रम किया है? सम्भव है कि आप ऐसे किसी आयोजन का भाग रहे हों, जहाँ लोगों को निःशुल्क भोजन दिया गया हो, बच्चों के... Read More
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  • 1 नवम्बर : प्रेम की व्यवस्था
    “यदि तुम पवित्रशास्त्र के इस वचन के अनुसार कि ‘तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख’ सचमुच उस राज व्यवस्था को पूरी करते हो, तो अच्छा ही करते हो।” याकूब 2:8 पिछली बार जब आपने कहा कि आप किसी व्यक्ति या किसी वस्तु से प्रेम करते हैं, तो आपका क्या अभिप्राय था? हमारे युग में हम प्रायः प्रेम को किसी विशेष भावनात्मक अनुभव के... Read More
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  • 9 अक्तूबर : प्रतिज्ञा के साथ शपथ
    “इसलिए जब परमेश्‍वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ रीति से प्रगट करना चाहा कि उसका उद्देश्य बदल नहीं सकता, तो शपथ को बीच में लाया। ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिनके विषय में परमेश्‍वर का झूठा ठहरना अनहोना है, दृढ़ता से हमारा ढाढ़स बंध जाए, जो शरण लेने को इसलिए दौड़े हैं कि उस आशा को जो सामने रखी हुई है प्राप्त... Read More
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  • 8 अक्तूबर : घर्षण पर विजयी होना
    “जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो, अर्थात् सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो; और मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो।” इफिसियों 4:1-3 घर्षण का एक उपोत्पाद गर्मी है: जब दो या दो से अधिक वस्तुएँ एक-दूसरे से रगड़ती हैं, तो तापमान बढ़ता है। इसी प्रकार, जब आप पापी... Read More
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  • 7 अक्तूबर : एक प्रतिष्ठित जीवन
    “जब यह देखा गया कि दानिय्येल में उत्तम आत्मा रहती है, तब उसको उन अध्यक्षों और अधिपतियों से अधिक प्रतिष्ठा मिली; वरन् राजा यह भी सोचता था कि उसको सारे राज्य के ऊपर ठहराए। तब अध्यक्ष और अधिपति राजकार्य के विषय में दानिय्येल के विरुद्ध दोष ढूँढ़ने लगे; परन्तु वह विश्वासयोग्य था, और उसके काम में कोई भूल या दोष न निकला, और वे ऐसा कोई... Read More
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  • 30 सितम्बर : पवित्रता का मार्ग
    “क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे तो मरोगे, यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे तो जीवित रहोगे।” रोमियों 8:13 आपकी पवित्रता महत्त्वपूर्ण है। पुराने नियम में “पवित्र” शब्द सदा नैतिक अवस्था को ही नहीं दर्शाता; प्रायः वह एक सम्बन्ध को दर्शाता है। नगरों को पवित्र नगर कहा गया है, पात्रों को पवित्र पात्र, और भवनों को पवित्र स्थान कहा गया है।... Read More
    6 min